अहसास ! अनुभूति! यह शब्द अपने आप में ही सम्पूर्ण है।
समझने वाले समझ जाते और नहीं समझने वालों को समझाना भी व्यर्थ।
हर टूटते रिश्तों के पीछे अहसास की कहानी जुड़ी होती है। माँ और पिताजी का प्रेम एक समान, फिर भी अहसास में, हर बात में माँ आगे होती है।
कल भी और आज भी और आगे भी यही होता आ रहा है और होता रहेगा। बच्चों को महंगे स्कूलों में दाखिला हो या बच्चों की जरूरतें। माँ के गहने हों या कपड़ों से भरी आलमारी। परिवार में रौनक। सभी पिता की जी तोड़ मेहनत की देन है।
फिर भी पिता को शिकायत नहीं। और लोग अहसास दिलाने में भी कमी करते हैं ,कि पिता जी के कितने अहसान है हम पर।
बच्चों को पढाई में प्रोत्साहन देना, कार्य स्थल पर कर्मचारी को उसके कार्यों के लिए शाबाशी देना, प्रेम में अपनी दूरी, बदिशें की तड़प को व्यक्त करना। परिवार में एक दूसरे के कामों की तारीफें करना। रिश्तों में, दोस्ती में सुख- दुःख में आर्थिक सहायता न करने पर भी बातों से ही हिम्मत देना, ये सभी अहसास ही हैं।
पर बड़े दुःख की बात है, आज के समय में हम इसे पीछे छोड़ कर आगे बढ़ते जा रहे हैं और इसी कारण से हम लोगों से और लोग हमसे दूर होते जाते है।
यहाँ तक कि पशु- पक्षी भी अहसास की भाषा समझते हैं।
इसलिए रिश्तें चाहे खून के हों या हमारे द्वारा गढ़े गए ( बनाए गए) सभी में अहसास का होना जरूरी है। प्यार, सौहार्द और भाईचारे के लिए।।
श्वेता कर्ण
पटना( बिहार)

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