कहावत है कि बद अच्छा, बदनाम बुरा। गलत होने में कोई समस्या नहीं है। पर गलत न होने पर भी बदनाम होना वास्तव में सबसे बड़ी समस्या है। बदनाम व्यक्ति का साथ कोई नहीं देता। अनेकों चालाक लोग जो बुराइयों के शिखर पर खड़े होते हैं, समाज में देवता की तरह पूजे जाते हैं। तथा अनेकों देव अपने अस्तित्व के लिये दुखी बने रहते हैं।

   अनेकों बार धन संपदा की आड़ में बुराइयाँ छिपी रहती हैं। धार्मिक आयोजन में खुलकर खर्च करने बाला बड़ा ईश्वर भक्त और धार्मिक माना जाता है। सामाजिक कार्यक्रमों में धन लगाने बाला समाज सुधारक माना जाता है। जबकि वह धन किस तरह अर्जित किया है, यह प्रश्न हमेशा गोढ रह जाता है। अनेकों के हक पर डाका डालकर धनी बनना कितना सही है। उस अधर्म के धन से ईश्वर को भी रिश्वत देना कितना सही है। हालांकि ईश्वर उस रिश्वत को स्वीकार भी करते होंगें, यह सबसे बड़ा प्रश्न है। निश्चित ही ऐसे अधर्मी कभी भी ईश्वर का प्रेम नहीं पाते। पर संसार में तो वही ईश्वर भक्त माने जाते हैं।

   दीपावली के अवसर पर भी माता लक्ष्मी की माता सरस्वती और भगवान गणेश के साथ ही आराधना की जाती है। निश्चित ही अच्छे जीवन निर्वाह के लिये धन आवश्यक है। धन धर्म की राह भी बनता है। धन होने पर ही दान किया जा सकता है। पर वह धन भी गलत तरीके से प्राप्त न हो। धन प्राप्ति के बाद भी बुद्धि सत्कर्मों में लगी रहे। यह परम आवश्यक है।

   दीपावली के अवसर पर शुभ लाभ की प्रार्थना की जाती है। कारोवर में, रोजगार में, खेती में, नौकरी में, जो जिस तरह जीवन यापन कर रहा है, उसमें लाभ चाहना कभी गलत नहीं है। पर वह लाभ शुभ भी होना चाहिये। वह लाभ धर्म सम्मत होना चाहिये।

  सत्य तो यही है कि मनुष्य प्रतीकों को समझता नहीं है। बस उन्हें जैसे के तैसा दुहराता जाता है। यदि प्रतीकों का अर्थ समझ जाये तो संसार ही बदल जाये। फिर बदनाम होना बुरा नहीं होगा अपितु बद होना बुरा माना जायेगा।

   ठाकुर नरेश सिंह के बड़े बेटे राजीव जो भारतीय सेना का जाबाज अधिकारी था, उसकी आत्मा देश के लिये शहीद होने के बाद छह वर्षो से अपनी जन्म भूमि पर सम्मान की लालसा से तड़प रही थी। न तो उसके पिता ने उसे अग्नि थी और न ही गांव बालों ने उसे कंधा दिया था। आज भी उसकी शहादत से ज्यादा चर्चा उसके गलत कदम की होती थी। आज भी राजीव का स्मरण ठाकुर समाज की नाक काटने बाले मनचले युवक के रूप में होता था। हालांकि उसका कोई भी कर्म कानून और धर्म की परिभाषा में भी गलत नहीं था।

   अनेकों बार कुछ बुराइयाँ समाज में इस तरह व्याप्त हो जाती हैं कि बुराइयाँ अच्छाई का रूप रख लेती हैं। अधर्म धर्म बन लोगों के मन में बस जाता है। पीढी दर पीढी गलत को सही सुनते आये लोग गलत को ही सही मानते हैं। फिर धर्म की राह पर खड़ा व्यक्ति भी अधर्मी माना जाता है। समाज की बुराइयों को चुनौती देना वैसे भी आसान नहीं होता है।

   दूसरी सच्चाई यह भी है कि समाज में नैतिकता का पाठ पढाने बाले अनेकों के आचरण वास्तव में बहुत अनैतिक होते हैं। पर उनकी अनैतिकता की ज्यादा चर्चा नहीं होती है। मात्र कुछ  ढोंग कर दिखाने से ही मनुष्य धर्मी बन जाता है।चरित्रहीन होने पर चरित्रवान गिना जाता है। 

   राजीव धर्मी था या अधर्मी, निश्चित ही इस पर विवाद हो सकता है। पर राजीव कभी भी दुहरे चरित्र का मालिक नहीं रहा था। जिस बात को स्वीकार करता था, उसे कहने का साहस रखता था।

  ठाकुर नरेश सिंह के शेष दो बेटे संतोष और प्रेम अतुल संपत्ति के मालिक थे। संतोष लोक निर्माण विभाग में अधिकारी था, तो प्रेम भी दिल्ली विकास प्राधिकरण में अधिकारी। निश्चित ही दोनों अपने प्रतिष्ठानों से बहुत वेतन पाते थे, पर दोनों की संपत्ति में ज्यादातर योगदान रिश्वत की आय का था। दिल्ली जैसे महानगर में प्रेम का शानदार बंगला था जिसकी कीमत ही करोड़ों में थी। संतोष की भी अनेकों शहरों में अकूत संपत्ति थी। दोनों ही धार्मिक आयोजनों में बढ चढकर खर्च करते। चाहे नवदुर्गा का अवसर हो अथवा गणेश चतुर्थी का। दोनों धन कुबेर अपने धन के दरबाजे खोल देते। हालांकि उनके द्वारा किया गया खर्च वास्तव में उस रिश्वत की आय का एक हिस्सा मात्र होता था। जैसे वह विभिन्न ठेकेदारों से उनकी आमदनी का एक हिस्सा रिश्वत के रूप में लेते थे, ठीक उसी तरह उन्हें भगवान को रिश्वत देने में कोई आपत्ति नहीं थी। भगवान को रिश्वत देकर अपना परलोक सुधार रहे थे। पर सत्य यह भी था कि परलोक जैसी मान्यता में भी उनका कोई विश्वास न था। विश्वास तो उन्हें ईश्वर के अस्तित्व में भी न था। पर अपने विश्वास को भी समाज के समक्ष व्यक्त कर पाने में वह असमर्थ थे। 

जहाँ राजीव अपनी धारणा पर टिककर अपयश का पात्र बना। वहीं संतोष और प्रेम दोनों ही समाज में सम्मानित थे। अपने अपने क्षेत्र में दोनों ठाकुर समाज के मुखिया थे। 

   मान लिया कि आर्थिक उन्नति ही उन्नति है। आर्थिक उन्नति के लिये किसी भी सिद्धांत को तिलांजलि दी जा सकती है। फिर भी दोनों की आर्थिक उन्नति मे कुछ योगदान तो ठाकुर नरेश सिंह का निश्चित ही था। दोनों की मंहगी पढाई का खर्च उन्होंने ही उठाया था। पर वह तो पिता का कर्तव्य है। पर पुत्र का भी कुछ कर्तव्य होता है, इस विषय में दोनों की बुद्धि शांत थी। 

   ठाकुर साहब अपनी संगिनी के साथ गांव में इस आयु में भी एकाकी रह रहे हैं। दूसरी तरफ दोनों बेटे अपने ऐश्वर्य पूर्ण जीवन में मग्न हैं। हालांकि दोनों गांव आते हैं। पर शायद माता पिता की आवश्यकता पूर्ति हेतु नहीं। ठाकुर साहब की भूमि से हुई आय पर भी तो बेटों का अधिकार होता है। फिर खुद का अधिकार लेना कौन सा बुरी बात है। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'