बहुत थका सा मन मेरा चल निकला उस ओर 
घूमते घूमते हो गई शाम से जाने कब भोर 
ना वो गली मिली ना मिला उसका छोर
एक टूटा सा आंगन बीच में था नीम का पोर
एक चिड़िया अकेली जाने किसकी राह देखती 
पूछा मैने , कहा गया मेरा वो बचपन 
बता तो कहा गया मेरा वो अपना माटी का घर
कुछ तो निशानी होगी या याद ही कोई पुरानी होगी
एक आह भरी उसने और देखा भर आंखे मेरी और
ना तुम वो हो ,ना बचपन ना यह आंगन अनमोल 
चले जाओ उस दुनियां में ,स्वार्थ है जहां हर रोज
भूल जाओ पगले अब यहां कोई नहीं रहता 
खोजता तू यहां वहां वक़्त मिले तो खोजना 
वहां जहा छोड़ा था आख़री बचपन का था दौर।

© रेणु सिंह " राधे " ✍️
कोटा राजस्थान