क्या गेंरुआ या श्वेत वस्त्र पहन लेना ही सन्यास है। क्या किसी संप्रदाय का तिलक मस्तक पर धारण कर लेने मात्र से कोई मनुष्य साधन की उच्च अवस्था को पा लेता है। क्या कठोर तप किसी के मन में छिपे ग्लानि और अपमान को धोने में समर्थ है।
निश्चित ही नहीं। उपरोक्त तरीके तो मात्र साधन हैं। संन्यास तो मन की स्थिरता है। मन को परमात्मा में पूरी तरह लगा देना। पर यदि मनुष्य संसार से भागकर सन्यास पथ पर बढ रहा है तो अनेकों बार संसार की पुरानी यादें उसका पीछा करती हैं। कई बार वह खुद से पूछता है कि उसने ऐसा क्यों किया। कई बार दूसरों के कार्यो की समीक्षा करने लगता है। अंतरात्मा के पुराने घावों को याद कर कर फिर से और ताजा करता रहता है। सन्यास के बाद भी सांसारिक यादों के भवर में गोते खाता रहता है। निश्चित ही साधना के प्रभाव से अनेकों बार उन डरावनी यादों से बाहर आ जाता है। पर ज्यादातर तो वह डरावनी यादें ही साधक के मन को साधना के पथ से हटाती रहती हैं। फिर मन से ईश्वर का ध्यान भी नहीं होता है। केवल शरीर अपनी क्रियाओं को करता रहता है। मन और शरीर का कोई संबंध नहीं रहता है।
बिना ईश्वर अर्पण बुद्धि से किये कर्म भी मनुष्य को कर्म बंधन में बांधते ही हैं। अनेकों बार कर्म बंधनों से मुक्त होने की आशा में सन्यास लेने बाला उन्ही बंधनों में और जकड़ जाता है।
सन्यास की शिक्षा देने बाले गुरु का परम कर्तव्य बताया है कि वह भली भांति समझ ले कि सन्यास चाहने बाला सन्यास के योग्य है भी या नहीं। क्या वह सांसारिक यादों को मिटाकर सन्यास के पथ पर बढ भी सकेगा।
पर अक्सर ऐसा होता नहीं है। अनेकों बार संप्रदाय को बढाने की इच्छा मात्र से अनेकों को सन्यास दिला दिया जाता है। संसार की विषेली यादों को वह छोड़ नहीं पाता है। सन्यासी बनने के बाद भी उन्ही यादों में अपनी आत्मा को जलाता रहता है।
गेंरुआ वस्त्र और सन्यास के सभी चिन्हों को खुद पर धारण किये एक युवक अभी भी अपनी पुरानी यादों से नहीं निकला है। आज भी वह अनेकों बार बैचेन हो जाता है कि शायद उसके बुजुर्ग माता पिता उसकी राह देख रहे हैं। बड़े भाई के दुर्घटना में संसार छोड़ देने के बाद केवल वही तो माता पिता के जीवन का सहारा था। पता नहीं कि अब अम्मा और बाबू संसार में हैं भी या नहीं। अकेली भाभी अपनी बेटी के साथ किस तरह जीवन काट रही हैं।
आज जिन बातों को वह सोच रहा था, उसने उस दिन क्यों नहीं सोचा जबकि वह अपने दुख से दुखी होकर गांव से चला आया था। उसे जो दुख मिला था, वह उसकी खुद की भूल थी। उसका खुद का विश्वास था जो कि सच न था। पर इसमें घर बालों का क्या दोष। आज भी वह अपने घर वापस जाना चाहता था। बुजुर्ग माता पिता की सेवा कर पुत्र धर्म निर्वाह करना चाहता था। पर चाहकर भी वह कर नहीं पाता ।
आखिर वह दर्द उसे मिला क्यों। यादों के अंतराल में जब वह उतरता तो ज्यादा ही दुख भरी कहानी दिखाई देती। प्रेम में मनुष्य का जीवन बदल जाता है। लगता है कि शायद अनेकों बार नहीं। अनेकों बार मनुष्य प्रेम का नाटक करता है। प्रेम को भी अपने उद्देश्य पूर्ति का हथियार बना लेता है। ऐसे स्वार्थ भरे प्रेम में धोखा ही मिलता है। टूटे दिल का प्रेमी अंदर से इतना टूट जाता है कि उसे संसार में सर्वत्र धोखा ही नजर आता है।
संतों की टोली में सम्मिलित युवा संत जिसका वर्तमान नाम स्वामी नित्यानंद था, वास्तव में आज भी आनंद से बहुत दूर था। यह दूसरी बात थी कि वह भगवान की कथाओं को सुनकर अनेकों बार भाव विह्वल होकर नृत्य भी करने लगता। भगवान के नामों का उच्च स्वर से जाप करता। आश्रम की हर व्यवस्था में बढ चढकर हिस्सा लेता।
नित्यानंद जानता है कि प्रेम में धोखा पाया वह भी संत समाज को धोखा दे रहा है। अपनी पीड़ा कम करने के लिये ही वह इतने आडंबर रचता है। आज भी वह कोई नित्यानंद नहीं है। आज भी उसके मन में वही गांव का भोला भाला सोहन है। वह आज भी वही सोहन है जिसमें उसके माता पिता की जान बसती थी। जिसका भाई उसके लिये कुछ भी अर्पण कर देता था। जो अपनी बेबाकी से बड़े बड़ों को चुप कर देता था। जो ठाकुर परिवार में जन्म लेकर भी ऊंच नीच से दूर था। वही सोहन जो सारे गांव बालों को प्रेम से रहने का पाठ पढाता था। खुद प्रेम मार्ग में टूटकर छिन्न भिन्न हो गया। कुछ समय व्यथित रहा। बाबूजी ने उसका इलाज भी कराया। मानसिक स्वस्थ हो जाने के बाद भी क्या वह स्वस्थ हो पाया। क्या इलाज के दौरान मिले उसे विद्युत झटके उसकी दुखद यादों को मिटा पाये। ऐसा नहीं हुआ। यदि ऐसा हो जाता तो वह निश्चित ही प्रेम के व्यापक रूप को समझ पाता। समझ लेता कि केवल किसी लड़की से किया गया प्रेम ही प्रेम नहीं है।
लगता है कि प्रेम में धोखा देने की परिपाटी अनेकों बार दुहराई गयी है। सोहन जिस लड़की से प्रेम करता था, उसने उसे धोखा दिया। और सोहन ने क्या किया। जो उसे बहुत प्रेम करते थे, उन्हें असहाय छोड़कर भाग गया। क्या यह धोखा नहीं है।
सोहन स्वामी नित्यानंद बनकर भी धोखा दे रहा था। न केवल संत समाज से, अपितु खुद की आत्मा को भी। यह धोखे बाला जीवन कहीं से भी सन्यास नहीं है। सन्यास की राह पर चलने के लिये उसे एक बार फिर से संसार में जाना होगा। खुद को सन्यास के योग्य बनाना होगा। योग्य बन जाने पर संसार में भी सन्यास हो सकता है। तथा संसार की कुंठाओं को मन में रखा सन्यासी भी सन्यासी नहीं है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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