बच्चों आओ ....  अपने - अपने हिस्से की मिठाईयां .. कपड़े  और फुलझरियां  लें  लो । चिरपरिचित आवाज सुनते ही बस्ती  के  सारे बच्चे उस महिला की तरफ भागने लगे । बस्ती  के बीचो - बीच एक चमचमाती लाल रंग की बड़ी सी कार खड़ी थी और उस कार से कुछ दुरी पर ही  लंबा कद ...  गौर वर्ण ... बड़े - बड़े बाल ... कानों में सोने के बड़े - बड़े झुमके और कीमती साड़ी पहने एक महिला खड़ी थी जिसने अपने दोनों हाथों में बड़े - बड़े थैले पकड़ रखें थे । 

बस्ती के सभी बच्चें भागते हुए उस महिला के पास पहुॅंच गए । महिला ने अपने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए कुछ ही पलों में सभी बच्चों के हाथों को कपड़े ‌... मिठाइयां और फुलझडि़यों से भर दिया । बच्चें  बहुत खुश थे । उन्हें  देखकर ऐसा लग रहा था जैसे  वें  सभी इसी पल का इंतजार कर रहे थे । सभी बच्चे जब अपने - अपने झोपड़ियों  की तरफ जाने लगें  तो उस महिला ने एक बच्चे का हाथ पकड़ लिया और उससे  कहा :- 
" इस बार भी तुम्हारा दोस्त तुम सबके साथ  नहीं आया । तुमने उसे बता तो दिया था ना कि मैं आने वाली हूॅं ।"

' हाॅं आंटी !  मैंने उसे बता दिया था कि हर साल  की तरह आप दीपावली की रात जरूर आएंगी और हम सबको मिठाइयां .. कपड़े और फुलझरियां  देंगी ।'  बच्चे ने उस महिला की तरफ देखते हुए कहा । 

' उसने फिर क्या कहा ?'  महिला ने बच्चे से पूछा ।
' जाने दीजिए ना आंटी !  वह पागल है ।  वैसे ही बकबक करता रहता है । मैंने उसे कितना समझाया था कि आप हम सब बच्चों का कितना ख्याल रखती हैं ... हम सबके लिए हर साल दीपावली पर पटाखे .. कपड़े और मिठाइयां लाती है । हम सबकी एक - एक चीज का  ध्यान  रखती हैं । हम सबसे मिलने भी  आती रहती  हैं लेकिन वह कहता है  मुझे दूसरों  से कुछ नहीं लेना है ।  मैं एक दिन  खुद ऐसा बनूंगा कि मेरे पास सब कुछ होगा । आप ही बताओ आंटी !  क्या आप हमें भीख  देती हो ?  वह  कहता है कि मुझे भीख नहीं चाहिए । बहुत घमंडी है वों । खाने के लिए उसके घर में  कुछ नहीं है फिर भी इतनी लंबी जुबान है उसकी ।  उसकी माॅं यानी कि हमारी ताई  बड़ों  घरों में जाकर  बर्तन - पोंछा  का काम करती है तभी जाकर उनके घर का चूल्हा जलता है लेकिन जब से वह बीमार रहने लगी  है तब से मेरा दोस्त रमाकांत ही कहीं - ना - कहीं से कुछ पैसे लाता  है और फिर यें  लोग कुछ खा पाते हैं । आज दीपावली है ।  मालूम  नहीं आज उसने खाना खाया होगा या नहीं  ? सुबह सवेरे ही निकल गया था और शाम में वापस लौटकर  आया है  लेकिन  जब से लौटा  हैं तब से अपनी झोपड़ी से  बाहर भी नहीं आया है । घर में ही बैठा है ।  ना जाने क्या कर रहा है ? वैसे आंटी ! उसे ईश्वर पर बहुत विश्वास  है । कहता  है ईश्वर सबकी सुनता है । मेरी भी एक दिन सुनेगा और बगैर किसी के सामने हाथ फैलाए मुझे वह  सब कुछ मिलेगा जो मेरे नसीब में होगा । मुझे सिर्फ निरंतर प्रयास करना है और अपना कर्म करते जाना है । एक  दिन सफलता मुझे अवश्य मिलेगी ।'   बच्चे ने उस अमीर  महिला से कहा । 

' अच्छा ठीक है ।  तुम जाओ और  जाकर दीपावली मनाओ ।'  महिला ने बच्चे की तरफ प्यार से देखते हुए कहा । 

बच्चा दौड़कर  अपनी  झोपड़ी में चला गया । ' कैसा बच्चा है जिसे किसी का कुछ भी देना पसंद नहीं ।  इस दुनिया में बहुत सारे बच्चे मैंने देखे हैं जिन्हें  गरीबी  लाचारी  और उनकी  बेबसी  भीख मांगने पर मजबूर कर देती है लेकिन यह बच्चा किसी का दिया हुआ सामान भी भीख समझता है । ऐसे बच्चे से मुझे मिलना होगा ।  पिछले ५  सालों से मैं इस बच्चे से मिलना चाह रही थी लेकिन यह बच्चा मेरे पास नहीं आया । मैंने सोचा था कि ५  सालों  में एक -  ना -  एक  दिन ऐसा अवश्य  आएगा जब यह बच्चा  खुद मेरे पास आएगा लेकिन  ऐसा कोई दिन  नहीं आया जब यह बच्चा  खुद चलकर मेरे पास आया हो इसलिए आज मुझे ही इसके पास जाना होगा ।'  महिला ने मन ही मन में कहा । 

जैसे ही उस महिला ने झोपड़ी के अंदर लगे पर्दे को हटाया उसने देखा कि एक मध्यम रोशनी पूरी  झोपड़ी में फैली हुई है । उसी मध्यम रोशनी में उसने  अपनी नजरें चारों तरफ दौड़ाई तो देखा कि  नीचे जमीन पर  एक १२ - १३  साल का लड़का बैठा हुआ था । उससे कुछ दूरी पर एक  औरत खाट पर लेटी खांस रही थी ।  उसकी हालत देखकर लग रहा था कि वह कई दिनों से बीमार है । जैसा कि बच्चे ने भी कहा था कि इसकी माॅं  की तबीयत  कई दिनों से ठीक नहीं है । महिला ने धीरे-धीरे  अपने कदम आगे बढ़ाएं । जमीन पर बैठा बच्चा शायद पूजा कर रहा था तभी तो उसने अपनी आंखें बंद कर रखी थी और कुछ  मंत्र बुदबुदा  रहा था । औरत ने देखा कि सामने मिट्टी के बनें  लक्ष्मी और गणेश  की मूर्ति रखी हुई थी लेकिन  मूर्ति की मिट्टी अभी भी पूरी तरह सुखी नहीं थी । अभी भी गीली थी । ना तो उस मूर्ति पर पेंट ही  हुआ था और ना ही वह मूर्ति सुखी ही थी फिर भी जिस किसी ने उस मूर्ति को बनाया था उस महिला का मन उसकी तारीफ करने को कर रहा था । 

' यह तो लक्ष्मी माॅं  की पूजा कर रहा है । सही कहा था उस बच्चे ने कि इसे  ईश्वर पर विश्वास है तभी तो इतनी कम उम्र में ही  पूजा - पाठ  कर रहा है । जहां अभी के बच्चे ईश्वर के  होने में ही संदेह करते हैं । उनके अस्तित्व पर ही  सवाल उठाते हैं  वहीं पर यह बच्चा  अपने सामर्थ्य के अनुसार पूजा - पाठ में लगा  है  वों  भी एक मोमबत्ती रखकर ।'  महिला ने बच्चे की तरह देखते हुए मन ही मन में सोचा । 

" ललाट पर तेज आपके मानों है इतना 
  सूरज  भी  फीका पड़ रहा हो जितना 
  अद्वितीय सौंदर्य की आप हो मलिका 
  ऐसा  रूप  स्वयं  ईश्वर  ही  है  गढ़ता " 

अनायास ही बच्चे के मुख से अपनी तरफ देखते हुए ऐसी बातें कहना महिला को सुखद तो लग ही रहा था लेकिन वह इस समय किसी और की झोपड़ी में खड़ी  थी और उसे अपना परिचय देना चाहिए यह सोचते हुए उसने उस बच्चे की तरफ देखते हुए कहा :- " मैं पिछले ५  सालों से प्रत्येक दीपावली पर इस बस्ती  के  बच्चों  को कपड़े मिठाइयां और पटाखे देने आती हूॅं लेकिन इन ५ सालों में एक बार भी तुम मेरे पास यें  सारी चीजें लेने नहीं आए ।  मैं इंतजार करती रही लेकिन तुम नहीं आए । सब कहते हैं तुम घमंडी हो। तुम्हें दूसरों  के द्वारा दी गई चीजें भीख  लगती है लेकिन मैं यह तुम पर तरस खाकर तुम्हें नहीं दे रही हूॅं  बल्कि अपनी खुशी से तुम्हें दे रही हूॅं ।  तुम मुझसे माॅंग भी नहीं रहे हो । यें तो  मैं  तुम्हें अपनी मर्जी से दे रही हूॅं  बेटा  ।" 

' एक क्षण  को लगा कि आप लक्ष्मी माॅं हो ।  मैं अभी उनकी ही तो अपने हाथों से  मूर्ति बनाकर पूजा कर रहा था । आप मेरे घर में आई  इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद लेकिन मैं आज भी आपके द्वारा लाई गई चीजें स्वीकार नहीं कर सकता । मेरे दोस्तों ने आपके बारे में मुझे बताया था । आज दीपावली है और मुझे  लक्ष्मी माॅं  की पूजा करने में देर हो रही थी इसलिए मैं यहां पूजा करने आ गया ।  वैसे   इस साल मैं भी  चाह रहा था कि आप से बातें  कर आपको समझा दूं  कि मैं आपसे यह सारी चीजें नहीं ले सकता ।'  उस बच्चे  ने कहा । 

' क्यों नहीं ले सकते ?  क्या  मुझे इसका कारण बता सकते हो बेटा ? '  महिला ने बच्चे की तरफ  देखते हुए  उससे  पूछा । 

' मैं ईश्वर की भक्ति के साथ-साथ अपने कर्मों पर भी  विश्वास करता हूॅं  और जो कर्म  मैं करता हूॅं  उसके  फल की इच्छा ही  मैं रखता हूॅं ।  मैंने आपके लिए तो कुछ किया ही नहीं फिर मैं यें सब  आपसे  कैसे ले सकता हूॅं ?'  आज भी मैंने अपनी खुद की कमाई के पैसे से ही  यह मोमबत्ती  खरीदी है और  लक्ष्मी माॅं  के लिए कुछ प्रसाद लाया हूॅं । मुझे लक्ष्मी माॅं  पर पूर्ण  विश्वास है कि आज नहीं तो कल वह  मेरे  घर में अवश्य  आएंगी ।  उनका आगमन  मेरे घर में एक दिन अवश्य  होगा ।'  बच्चे ने दृढ़ता  के साथ  कहा । 

' तुम्हारा नाम क्या है ?'  महिला ने मुस्कराते हुए एक बार फिर उस बच्चे से पूछा । 

' रमाकांत नाम है मेरा लेकिन इस बस्ती के लोग मुझे रामू  कहकर  पुकारते हैं । मेरी माॅं  भी मुझे इसी नाम से पुकारती है ।'       बच्चे ने कहा । 

' ठीक है रामू  ! अब मैं चलती हूॅं । वैसे भी मेरा अब  क्या काम ?  मैं जिस काम के लिए यहां आई थी वह तो हुआ  नहीं ।'   अमीर महिला  ने कहा । 

' आप मेरे घर में आई  इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद लेकिन जो आप  चाह रही थी उसे मेरा स्वाभिमान लेने से मना कर रहा है इसलिए हाथ जोड़कर विनती है कि मेरे द्वारा कही  गई  बातों का आप  बुरा ना माने ।'       रामू ने कहा ।

'नहीं ...  नहीं ...  रामू  ! मुझे तुम्हारी बात का बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा है । मुझे  इस बात की खुशी है  कि हमारे देश में इतनी कम उम्र के बच्चे भी स्वाभिमानी  और समझदार हैं जिन्हें अपने संस्कारों में रहने के साथ-साथ  अपनी जिम्मेदारियों का भी  एहसास हैं ।' 
अमीर महिला ने कहा । 

इस घटना को बीते अब  दस  साल हो चुके हैं । रामू  की उम्र अब तेईस - चौबीस  साल की है । इस नगर का प्रख्यात मूर्तिकार वह  बन चुका है । पढ़ा लिखा मूर्तिकार  होने के साथ-साथ वह  बहुत बड़ा  बिजनेसमैन भी है  । किसी चीज की कमी नहीं है उसके पास । वैसे तो कलाकारों से भरे हमारे देश में ऐसे हस्त शिल्पकारों   की भरमार है जो पत्थरों  को तराशकर सुंदर सलोने भगवान बना देने की काबिलियत रखते हैं लेकिन रामू   एक ऐसा  मूर्तिकार है  जिसे माता सरस्वती  ने पत्थरों से इन्सान  और ईश्वर की मूर्ति गढ़ने का अनोखा हुनर बख्शा है । ईश्वर को मानने वाले भी आस्था के नाते मूर्तियों को ही  भगवान मानकर उनकी पूजा - आराधना करते हैं ।  किसी व्यक्ति को हू - ब - हू पत्थर या मिट्टी में ढा़लना कहीं ज्यादा मुश्किल काम है क्योंकि नयन नक्श, पहनावे, नख ,  चेहरे का आकार , शरीर की बनावट आदि में जरा सा भी  फेरबदल  पूरी  प्रतिमा का स्वरूप बदल सकती  है । रामू   माॅं  सरस्वती और लक्ष्मी माता  का  सबसे बड़ा  साधक हैं। किशोरावस्था के  दिनों में ही उसने मिट्टी से लक्ष्मी माॅं की मूर्ति  बनाकर उस अमीर महिला का दिल जीत लिया था । उस अमीर महिला  ने उसके  सिर पर कला की देवी माॅं  सरस्वती के इस आशीर्वाद को पहचाना और  उसे  मुंबई के सर जे . जे.  स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिला लेने के लिए स्कालरशिप  दिलवाई वो भी रामू  की बिना जानकारी के ।  अपनी प्रतिभा के बल पर  इस स्कूल में  भी रामू  सबसे आगे रहा और इस तरह उसकी कला को नई ऊंचाईयां मिलने लगी । इतनी कम उम्र में ही उसे   प्रतिष्ठित मायो स्वर्ण पदक भी  दिया गया । 

रामू  की जिंदगी में  दस साल पहले जो अचानक से परिवर्तन आया था उसकी वजह शायद उसे आज भी मालूम नहीं पड़ती अगर स्कूल ऑफ आर्ट के प्रिंसिपल सर ने उसे यह बात आज बताई ना होती । हुआ यह था कि आज  प्रिंसिपल सर का विदाई समारोह था । जब रामू  प्रिंसिपल सर को बधाई देने  उनके केबिन में जा रहा था तभी  उसने अचानक से अपना नाम  सुना । वह ठिठक कर बाहर ही खड़ा हो  गया । प्रिंसिपल सर  किसी महिला से  बात  कर रहे थे । महिला की आवाज भी उसे जानी - पहचानी लग रही थी । उसने जो कुछ भी  उस दिन उस केबिन के बाहर खड़े होकर सुना उसे सुनकर उसके होश ही उड़ गए । आज तक अपनी कामयाबी का श्रेय वह स्वयं  को ही देता आया था और उसे इस बात का गर्व भी  था  कि  उसने अपने कर्म द्वारा यह कामयाबी पाई है। यह  सच भी था कि उसने अपने कर्म के द्वारा ही इस कामयाबी को पाया था लेकिन उसे  किसी का साथ भी तो  मिला था और यह बात  वह पहले से नहीं जानता था  । यह बात उसने आज जानी थी । 

रामू  एक कोने में खड़े होकर उस महिला के केबिन से  निकलने का इंतजार कर रहा था क्योंकि उसके दिमाग में फैला अंधेरा अब  प्रकाश का रूप ले  चुका था और वह इस बात को जान चुका था कि उसकी मदद करने वाली कौन है ? वह तो सिर्फ  इस बात की तसल्ली कर लेना चाहता था कि वह जो सोच रहा है वह  सही है या गलत ? 

' तुम यहां कैसे ? मेरा मतलब है कि तुम मेरे  घर पर ..  आज अचानक ?'  महिला ने रामू  को आश्चर्य से  देखते हुए  कहा । 

' मुझे तो लगा था कि आप मुझे नहीं पहचानेंगी लेकिन आपने तो मुझे पहचान लिया क्योंकि जहां तक मुझे याद है यह हमारी दूसरी मुलाकात है ।'  रामू  ने मुस्कुराते हुए कहा । 

' हाॅं ... नहीं ... मैं तो ऐसे ही पूछ रही थी ।'  महिला ने 
कहा । 

' आप मुझे देखकर घबराइए नहीं ।  मैं जानता हूॅं   आप इसलिए घबरा  रही है कि मुझे अगर यह  बात पता चल गई कि  आपने मेरी मदद की है तो हो सकता है कि मैं आपसे नाराज हो जाऊं ? ऐसा बिल्कुल भी नहीं है ।  मैं आपसे नाराज नहीं हूॅं  । मैं तो  आपका शुक्रिया अदा करने आया हूॅं । आप तो जानती  ही हैं  कि  मुझे  ईश्वर  पर अटूट  विश्वास है ।  ईश्वर स्वयं तो आ  नहीं सकते इसीलिए हम जैसे भक्तों पर अपनी कृपा दिखाने के लिए आप जैसे लोगों को हमारी जिंदगी में भेज देते हैं । आज से दस  साल पहले की दीपावली के दिन  आप मेरी झोपड़ी में लक्ष्मी माॅं  बन कर ही तो आई थी ।  आपको याद तो होगा ही । मैंने आपको देख कर कहा था कि मुझे एक पल को लगा कि मेरे घर पर लक्ष्मी माता का आगमन हुआ है । मेरी जिह्वा पर  उस समय  सरस्वती माता  विराजमान थी  यही वजह थी कि मैंने आपको लक्ष्मी माॅं  कहकर संबोधित किया था । उस  दीपावली के दिन अगर आप मेरी झोपड़ी में नहीं आती तो  आज मैं ना तो इतना बड़ा मूर्तिकार ही  बन पाता और ना ही आपके सामने यूं सफल होकर खड़ा ही हो पाता । मैं तो प्रिंसिपल साहब और आपकी बातें सुनकर  हैरान हो गया था  क्योंकि दीपावली के दिन  लक्ष्मी माॅं  ने अपने नाम की ही  महिला को मेरे पास मेरी मदद करने को  भेजा था ।'   रामू  ने उस महिला के पैर छूने के बाद कहा । 

' ऐसे तो मैंने बहुत सारे बच्चों  की मदद की है  लेकिन तुम उन बच्चों जैसे नहीं थे ।  तुम  बिल्कुल अलग थे इसलिए तुम्हारी मदद मुझे  बिल्कुल अलग तरीके से करनी थी यही वजह थी कि  मैंने तुम्हें बिना बताए यें  सब किया । मैंने उस  दिन तुम्हारे हाथों में सरस्वती माॅं  द्वारा मिला  हुनर देख लिया था इसलिए मैं  तुम्हें सरस्वती माॅं  के साथ - साथ लक्ष्मी  माॅं   का  भी साथ देना  चाहती थी ।'  लक्ष्मी देवी ने कहा । 

' आंटी ! दो  दिन  बाद दीपावली है और मेरी दिली ख्वाहिश है कि आप लक्ष्मी पूजन में मेरे  घर  पर  आए । एक बार फिर मैं अपने घर में लक्ष्मी माॅं का आगमन चाहता हूॅं  और इस बार  मैं चाहता हूॅं  कि लक्ष्मी माॅं  की मूर्ति के साथ उस साक्षात लक्ष्मी माॅं  की भी  पूजा करूं जिसने मेरी  जिंदगी को संवार दिया और मेरे जीवन से अंधेरे को हटाकर उनमें प्रकाश  की किरणें भर  दी ।'  रामू  ने  हाथ जोड़कर लक्ष्मी देवी से कहा । 

' तुम मेरे बेटे जैसे हो और एक माॅं  को अपने बेटे के घर  जाने  के लिए किसी बुलावे  की जरूरत नहीं होती है । माॅं  का आगमन अपने बेटे के घर में स्वयं ही हो जाता  हैं ।  मैं दीपावली के दिन तुम्हारे घर अवश्य  आऊंगी और हम  साथ मिलकर  दीपों का त्योहार दीपावली मनाएंगे ।'      लक्ष्मी देवी ने रामू के सर पर हाथ रखते हुए कहा । 

कुछ देर बाद  रामू  अपने घर जा रहा था । आज वह बहुत खुश था। उसके जीवन में लक्ष्मी माॅं  का  आगमन तो बहुत पहले ही हो चुका था जिसके कारण वह आज सुखी और संपन्न  था लेकिन उसने  अपनी  माॅं  को  दस साल पूर्व की   दीपावली के दूसरे दिन ही खो दिया था और उस दिन से उसके जीवन में माॅं  की  कमी थी जो आज पूरी हो गई थी क्योंकि आज उसे  लक्ष्मी  देवी  के  रूप  में अपनी  माॅं जो  मिल गई थी । 


                                               धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻

" गुॅंजन कमल " 💓💞💗