कभी बृह्मा जी ने केवल पुरुष की रचना की थी। फिर भी सृष्टि आगे बढ न सकी। उनका सारा परिश्रम व्यर्थ गया। फिर महादेव की सलाह पर नारी की रचना की गयी। तभी संसार आगे बढ पाया।

   जिस विषय में त्रिदेवों में एक परमपिता बृह्मा धोखा खा गये, उस विषय में संसार के मनुष्य धोखा खा जायें, इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है। वास्तव में अधिकांश लोगों की चाह बेटे की ही होती है। बेटियां तो बिना इच्छा के जन्म ले लेती हैं। ज्यादातर प्रेम के लिये तरसती रहती हैं।

  यह किसी एक कन्या की कहानी नहीं है। यदि ध्यान से देखा जाये तो शायद यह अधिकांश कन्याओं की कहानी है। अधिकांश बेटियों को आगे बढने के कम ही साधन मिलते हैं। अधिकांश बेटियां आज भी माता पिता की अनिच्छा का दंश झेलती हैं। सभी धर्मों, जातियों और समाज में यह एक जैसी परंपरा दिखाई देती है।

  वैसे एक सत्य यह भी है कि कोई कन्या तभी तक आगे नहीं बढ पाती जब तक कि वह खुद को कमजोर समझे। खुद को दूसरों पर आश्रित समझे। एक बार मन में कोई जज्बा कन्या बना ले तो उसे कोई भी नहीं रोक सकता है। यह दूसरी बात है कि कन्या के सफल होने पर उसके अधिकांश संबंधी उसकी उन्नति में खुद की भूमिका बताते हैं। अनेकों बार बहुत सी बातें बढ चढकर सुनाई जाती हैं। अक्सर कन्या भी झूठी बातों का प्रतिवाद नहीं करती है।

   संध्या भले ही ठाकुर परिवार में नहीं जन्मी थी। पर कन्या की कहानी के रूप में उसकी कहानी भी अन्य कहानियों के समान ही थी। उसके जन्म के समय न केवल उसकी पिता रामदास का चेहरा उतरा अपितु माॅ कस्तूरी देवी के भी नैत्र आंसुओं से भर गये जैसे कि कन्या को जन्म कर उन्होंने कितना बड़ा अपराध कर दिया हो। मानो कि ईश्वर ने उन दोनों को किसी पूर्व जन्म के पाप का दंड दिया हो। 

   यदि पूर्व जन्म के पाप इस जन्म में फलदायी होते हैं तो पूर्व जन्म के पुण्य भी फलीभूत होंगें। व्रत उपवास और आराधना का असर हुआ। दूसरी संतान पुत्र हुई। नर्सों को मुंहमांगा नेग दिया गया। अच्छा उत्सव मनाया गया। 

  संध्या माता पिता से प्रेम के लिये बचपन तड़पती आयी थी। जो स्नेह उसके छोटे भाई को मिला, उसे कभी भी नहीं मिला। हालांकि संध्या का लक्ष्य निश्चित था। बचपन से ही संघर्षों को सहन करती आयी संध्या लक्ष्य प्राप्ति के लिये अनेकों संघर्षों से लड़ने में सक्षम थी।वहीं उसका छोटा भाई मनोज जो अत्यधिक स्नेह में पला बढा था, खुद अपनी कोई भी पहचान बना पाने में असमर्थ था। 

   परिस्थितियां अक्सर मनुष्य की सोच को बदल देती हैं। अथवा यह सत्य नहीं है। अनेकों बार परिस्थितियों के कारण मनुष्य अपनी सोच को बदलने का नाटक भी करता है। अनेकों बार मौकापरस्तता मनुष्य की सोच पर हावी हो जाती है। 

   लड़कियों को आधीन रखने की मानसिकता, उन्हें बंधनों में बांधे रखने की मानसिकता शायद न बदलती यदि मनोज कुछ भी कर पाने में सक्षम होता। यदि मनोज अपनी जिम्मेदारी उठा सकने में समर्थ होता तो शायद ही संध्या अपनी राह पा पाती। जब बेटा अपना जीवन निर्वाह करने में भी असफल रहा, उस समय बेटा और बेटी को बराबर समझने की धारणा विकसित हुई। जो मात्र एकपक्षीय थी। यथार्थ तो यही है कि बेटा और बेटी परवरिश में बराबरी के अधिकारी होते हैं। पर बेटी किसी अन्य के जीवन का अंग बनने जायेगी, इसलिये धर्मभीरु और समझदार माता पिता बेटी की आय से खुद को दूर ही रखते हैं। 

   आम लड़कियों से अलग संध्या को सेना की नौकरी करने की इजाजत इसी लिये मिली क्योंकि परिवार की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी न थी। नौकरी मिलने के बाद संध्या ने कभी भी अपने कर्तव्यों से मुंह नहीं मोड़ा। उसके अच्छे वेतन से परिवार अच्छी तरह पलने लगा। इधर छोटा होने के बाद भी मोहन की शादी कर दी गयी। पता नहीं बेरोजगार बैठे युवक में लड़की के माता पिता ने क्या देखा। पर निश्चित ही कुछ तो ऐसा देखा। संध्या की भाभी ज्योति को किसी भी चीज की कमी नहीं रही। आखिर उसकी अविवाहित ननद सेना में अधिकारी जो थी। ननद का खुद का खर्च ही कितना था। ज्यादातर तो वह घर ही भेज देती थी। 

   दूसरी तरफ संध्या के विवाह की चिंता शायद किसी को न थी। वैसे भी कोई चाहता नहीं था कि संध्या का विवाह भी हो। हालांकि इसके पीछे भी उन लोगों के बड़े अच्छे तर्क थे जो कुछ हद तक सही भी थे। 

   " बेटी। हमने सारी कोशिश कर लीं। अभी भी कर रहे हैं। पर अभी हमारा समाज इतना खुलकर नहीं सोच पाता है। फौजी लड़की से विवाह के लिये कोई भी लड़का तैयार नहीं है। वैसे हमने अपने समाज में फौज में तैनात लड़कों के घर बालों से भी बात चलायी है। पर लगता है कि लड़का और लड़की के विषय में उनके अलग अलग मापदंड हैं। 

   कुछ अलग हटकर करने बालों को अक्सर परेशानियों का सामना करना होता है। देखना तुम निश्चित ही बहुत अलग करके दिखाओंगी। ईश्वर के घर देर है पर अंधेर नहीं ।"

  संध्या ने कभी भी प्रतिवाद नहीं किया। सत्य जानने की आवश्यकता महसूस नहीं की। सत्य यह था कि भले ही सामान्य लोग फौजी कन्या को बहू बनाने के लिये तैयार न थे। पर फौज में कार्यरत कुछ युवको के घर बालों को रिश्ते से कोई भी आपत्ति न थी। उन्होंने संध्या के परिवार बालों की स्वीकृति की प्रतीक्षा भी की थी। पर जब उनका कोई उत्तर नहीं आया तो संध्या जैसी गुणवती कन्या को अपनी पुत्रवधू बनाने की चाह मन में दबाकर उन्होंने समय के अनुसार उचित निर्णय ले लिया। संध्या आयु के उस मोड़ पर पहुंच गयी जब यह माना जा सकता था कि अब वह आजीवन अपने वेतन से अपने भाई की गृहस्थी को पालती रहेगी। 

   जब यह माना जा रहा था कि संध्या के मन पर आजीवन परदा पड़ा रहेगा। उसे सच्चाई कभी नहीं मालूम होगी। उसी समय संध्या के जीवन में कुछ बदला। आखिर प्रेम ईश्वर प्रदत्त वह गुण है जो कभी भी किसी के जीवन में आ सकता है। कभी भी किसी को नयी राह दे सकता है। कभी भी किसी के जीवन के उद्देश्य को बदल सकता है। यथार्थ में परदा संध्या की बुद्धि पर नहीं पड़ा था। परदा तो उसके परिजनों की बुद्धि पर पड़ा हुआ था जो कि शायद ईश्वर की लीला को ही समझ न पाये। लगता है कि उचित आयु तक संध्या के विवाह न हो पाने का कारण यही था कि ईश्वर ने उसके लिये राजीव को निश्चित कर रखा था। भले ही राजीव उसके जीवन में कम ही समय रहेगा पर उसके मन में आजीवन निवास करेगा। शायद संध्या को ईश्वर ने संसार में इसीलिये भेजा था ताकि वह एक बार ऊंच नीच की धारणा को ध्वस्त कर नारी सामर्थ्य की पर्यायवाची बन सके। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'