आजाद भारत के आजाद नागरिक  हैं हम।
खुली हवा में सांस लेते हैं, 
विचारों से भी आजाद हैं;
कर्मपथ चुनने की आजादी है हमें, 
स्वप्न देखने और पूरी करने की आजादी है हमें,
कुछ न करने की भी आजादी है हमें, 
वस्त्र चयन से लेकर धर्म को मानने की आजादी है हमें। 
हमें सिर्फ आजादी चाहिए। 
लम्बे वस्त्रों से आजादी...
उलझे रिवाजों से आजादी...
परंपराओं से आजादी...
अपनी मौलिकता से आजादी....
अपनी जिम्मेदारियों से आजादी...
अपने दायित्व से आजादी...
रिश्तों को वहन करने से आजादी...
जाने यह आजादी हमें कहां ले जाएगी...
कि वह धागा जो परंपराओं में पिरोकर
रिवाजों और जिम्मेदारियों का बोध कराती थी;
कहीं कमजोर हो गई  है।
आजादी के नशे में बूढ़े- जवान सब शामिल हो गए।
अब कौन किसे रास्ता बतलाए!
आने वाली नस्ल के लिए एक बार फिर धागा बदलना होगा।
अपनी परंपराऐं सांस लेती रहें; 
कि आजादी को नये सिरे से समझना होगा।
जाने परिवार की बैया कहां गई, 
उसे फिर ढूंढ लाना होगा।
आजादी का नया अर्थ ढूंढना होगा।
                ✍ डॉ पल्लवी कुमारी पाम