कब तक करें हम सिर्फ रचना।
लक्ष्य तो है बुराई से बचना।
कब तक रचनाएं होंगी सार्थक।
अमल ना हो तब तक होगी निरर्थक।
नित दिन होती रचनाएं सृजन अनेक।
पर भारतवासी बन नहीं पाए एक।
क्या करेंगे हम सिर्फ लेके शोहरत।
कब हासिल होगी हमें असली दौलत।
काश रचनाएं बंद कर पाए शरारत।
काश लेखनी ला पाए शराफत।
नितदिन होता देश में लूट-खसोट।
नित होता किसी के ईमान पर चोट।
आए दिन होती देश में छेड़खानी।
काश रचनाएं रोके मनमानी।
काश रचनाएं करें स्वार्थ का दमन।
देश हमारा बने खिलता चमन।
        -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण।