प्रत्येक वर्ष की भांति कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान विष्णु आराम करने के बाद अपनी निद्रा से जागते हैं। इसी लिए ही इस तिथि से समस्त मांगलिक शुभ कार्य आदि करना कराना शुरू हो जाता है। इस दिन कहीं सुबह तो कहीं शाम के समय देवउठान की पूजा की जाती है। गन्नों से मंडप तैयार किया जाता है और सभी मौसमी फल भगवान को अर्पित कर दीपक आदि प्रज्वलित किए जाते हैं। इस दिन सुबह के समय तुलसी जी की भी पूजा की जाती है। देवउठनी या देवोत्थान एकादशी के दिन भगवान विष्णु के नाम का कीर्तन भी करना चाहिए। देवउठनी एकादशी के दिन हिंदुओं को निर्जल व्रत भी रखना चाहिए। देवोत्थान एकादशी के दिन किसी गरीब और गाय को भोजन अवश्य कराना चाहिए। इस बार की ये एकादशी तिथि 14 नवंबर 2021 की प्रातः 05 बजकर 47 मिनट से शुरू हो गई और 15 नवंबर की प्रातः 06 बजकर 37 मिनट पर समाप्त भी हो गई। 15 नवंबर को दिन में 1.10 बजे से 3.15 तक व्रत का पारण कर सकते हैं। इस दिन तुलसी की पूजा करने का भी विधान है। तुलसी की पूजा में तुलसी को सुहागिन महिलाएं सुहाग की चीजें और लाल चुनरी अर्पित कर तुलसी माता जी की विधिवत पूजा करती हैं।
*तुलसी के जन्म-विवाह की पौराणिक कथा*
तुलसी (पौधा) पूर्व जन्म में एक सुंदर लड़की थी, जिसका नाम वृंदा था। राक्षस कुल में जन्मी यह बच्ची बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी। जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में ही दानव राज जलंधर से संपन्न हुआ। राक्षस राज जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था। वृंदा तो बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी, वह सदा अपने पति की ही सेवा किया करती थी।
एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा.. स्वामी आप युद्ध पर जा रहे हैं, आप जब तक इस युद्ध में रहेंगे, मैं पूजा में बैठकर आपकी जीत के लिए ही अनुष्ठान करुंगी। जब तक आप नहीं लौट आते मैं अपना संकल्प नहीं छोड़ूंगी।
जलंधर तो युद्ध में चला गया और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गई। उसके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को न हरा सके। सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास पहुंचे और सभी ने भगवान से प्रार्थना की। भगवान बोले, वृंदा मेरी परम भक्त है, मैं उससे छल नहीं कर सकता। इस पर देवतागण बोले कि भगवान दूसरा कोई उपाय हो तो बताएं लेकिन हमारी मदद जरूर करें। इस पर भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप धरा और वृंदा के महल में पहुंच गए।
वृंदा ने जैसे ही अपने पति को देखा तो तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिया। इधर, वृंदा का संकल्प टूटा, उधर युद्ध में देवताओं ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया। जलंधर का कटा हुआ सिर जब महल में आ गिरा तो वृंदा ने बहुत आश्चर्य से भगवान की ओर देखा जिन्होंने जलंधर का रूप धर रखा था।
इस पर भगवान विष्णु अपने रूप में आ गए पर कुछ बोल न सके। वृंदा ने कुपित होकर भगवान को श्राप दे दिया कि वे पत्थर के हो जाएं। इसके चलते भगवान तुरंत पत्थर के हो गए। ऐसा देख सभी देवताओं में हाहाकार मच गया। देवताओं की प्रार्थना के बाद वृंदा ने अपना श्राप वापस ले लिया।
इसके बाद वे अपने पति का सिर लेकर सती हो गईं। उनकी राख से एक पौधा निकला।भगवान विष्णु जी ने उस पौधे का नाम तुलसी रखा और कहा कि मैं इस पत्थर रूप में भी रहूँगा,जिसे शालिकराम नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जाएगा। इतना ही नहीं भगवान ने यह भी कहा कि किसी भी शुभ कार्य में बिना तुलसी जी के भोग के पहले मैं कुछ भी स्वीकार नहीं करुँगा। तभी से ही तुलसी जी की हिंदुओं के घरों में पूजा होने लगी। कार्तिक मास में तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ किया जाता है। साथ ही देव-उठावनी या देवोत्थान एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है।
गाँव में लोग इस एकादशी पर्व को हड़ाहढ़ैया भी कहते हैं। इस दिन आँगन में स्थापित तुलसी माता जी की पूजा के साथ ही साथ घरों में दीपावली की ही तरह इस पर्व में भी दीप जलाये जाते हैं और पटाखा आदि भी फोड़ते हैं। बच्चे पुराने टायर ट्यूब आदि जला कर उसे गोल-गोल घुमाते हुए खुश होकर इधर उधर दौड़ भाग करते हुए खेलते हैं। घर की महिलाएं प्रातः घर की छत पर जाकर पूजा किये गए गन्ने के अग्र भाग को लेकर उससे सूप पीटती हैं। यह एक मान्यता है कि ऐसा करने से घर में दरिद्रता का वास नहीं होता,यदि है भी तो वह इस सूप की आवाज को सुन कर भाग जाता है।
*विशेष :*
कभी-कभी पड़ रहे नक्षत्र और ग्रहों के कारण यह भी देखने में आया है कि एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है,यदि कभी ऐसी ही स्थिति आपके सामने आ जाये तब गृहस्थ आश्रम से जुड़े लोगों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। संन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन का व्रत करना चाहिए।
*देव उठनी या देवोत्थान एकादशी का महत्व*
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस दिन से विवाह, गृह प्रवेश तथा अन्य सभी प्रकार के शुभ और मांगलिक कार्य आरंभ हो जाते हैं। माना जाता है कि भगवान श्रीविष्णु ने भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी को महापराक्रमी शंखासुर नामक राक्षस को काफी लम्बे युद्ध के बाद समाप्त किया था, और थकावट दूर करने के लिए वह क्षीरसागर में जाकर सो गए थे और चार मास पश्चात फिर जब वे उठे तो वह दिन देव उठनी एकादशी कहलाया। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु जी का सपत्नीक आह्वान कर विधि विधान से पूजन करना चाहिए। इस दिन उपवास करने का विशेष महत्व है और ऐसा माना जाता है कि यदि इस एकादशी का व्रत कर लिया तो सभी एकादशियों के व्रत का फल मिल जाता है और व्यक्ति सुख तथा वैभव प्राप्त करता है और उसके पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
पद्मपुराण के अनुसार इस दिन उपवास करने से सहस्त्र एकादशी व्रतों का फल प्राप्त होता है। जप,तप,होम, दान सब अक्षय होता है। यह एकादशी व्रत/उपवास हजार अश्वमेध तथा सौ राजसूय यज्ञों का फल देने वाला, ऐश्वर्य, सम्पत्ति, उत्तम बुद्धि, राज्य तथा सुख प्रदाता है। मेरु पर्वत के समान बड़े-बड़े पापों को नाश करने वाला एवं पुत्र-पौत्र प्रदान करने वाला है। इस दिन गुरु का पूजन करने से भगवान प्रसन्न होते हैं व भगवान श्रीहरि विष्णु जी की कपूर से आरती करने पर अकाल मृत्यु नहीं होती। अतः इस दिन व्रत करने का विशेष महत्व है।
*श्रीहरि विष्णु जी को तुलसी दल अर्पित करें*
पुराणों में उल्लेख मिलता है कि स्वर्ग में भगवान श्रीविष्णु के साथ लक्ष्मीजी का जो महत्व है वही धरती पर तुलसी का है। इसी के चलते भगवान को जो व्यक्ति तुलसी अर्पित करता है उससे वह अति प्रसन्न होते हैं। बद्रीनाथ धाम में तो यात्रा मौसम के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा तुलसी की करीब दस हजार मालाएं रोज चढ़ाई जाती हैं। इस दिन श्रद्धालुओं को चाहिए कि जिस गमले में तुलसी का पौधा लगा है उसे गेरु आदि से रंग कर सजाकर उसके चारों ओर मंडप बनाकर उसके ऊपर सुहाग की प्रतीक लाल चुनरी को ओढ़ा दें। इसके अलावा गमले को भी एक नई सुंदर साड़ी में लपेट दें और उसका श्रृंगार करें। इसके बाद प्रथम पूज्य सिद्धिविनायक श्रीगणेश जी सहित सभी देवी और देवताओं को आह्वान करते हुए
तुलसी माता और श्री शालिग्रामजी का विधिवत पूजन करें। एक नारियल दक्षिणा के साथ टीका के रूप में रखें और भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसी जी की सात परिक्रमा कराएं। इसके बाद हवन करें तथा कपूर से आरती करें। देव उठनी या देवोत्थान एकादशी का सनातन हिन्दू धर्म संस्कृति में बहुत ही बड़ा
महत्व है। इस व्रत एवं पूजा का जीवन में अच्छा प्रभाव पड़ता है। हमारे वर्तमान से लेकर के आगे भविष्य में भी सुन्दर एवं फलदायक परिणाम भी
प्राप्त होता है। भगवान श्रीहरि विष्णु जी ,लक्ष्मी जी और तुलसी माता की नियमित पूजा पाठ से
जीवन में सुख,स्वास्थ,धन,वैभव,यश,कीर्ति और सम्मान तथा शत्रु पर विजय प्राप्ति का प्रसाद तो मिलता ही है,व्यक्ति की सभी मनोवांछित विशेष कामनाएं भी पूर्ण होती हैं।
जय श्रीहरि विष्णु,जय माँ लक्ष्मी,जय तुलसी माँ।
लेखक :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.

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