वो घनघोर रात्रि का अंधकार,
जब चारों तरफ फैल जाता है।
उजाले का दूर तलक नाम न हो,
तो दिल खौफ से भर जाता है।

सर्द बर्फीली  हवा के वो झोंके,
करते  है  स्पर्श  जब  तन  को।
ठंडी-ठंडी    बयार    देती    है,
मदमस्त एहसास तन बदन को।

दिल में दबी हुई अनगिनत यादें,
वक्त की चादर से उभर आती है।
मानों   जोरदार   आंधियों     से,
हृदय  की  कुंडी  खुल  जाती है।

अतीत की यादों से भरी किताब,
 वक्त की गर्दिश में दब जाती है।
इस  घनघोर अंधकार में  वो भी,
गुलाब  की तरह महक जाती है।

पत्तो की धीमी मद्यम सी सरसराहट,
धीरे-धीरे सांझ का संदेश दे जाती है।
सुर्ख  लाल   रंग   का   वो  आसमाँ,
और   सिंदूरी   सांझ   होती      है।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश "उरई"