विचरण करते पंछी फिर से अपने नीड़ की ओर है आती
दूर से ही घंटी की ध्वनियां,रम्भानें की आवाजें आती
धूल उड़ाते गायें पशु धन गांव की गलियों में है आती
नन्हे मुन्ने बरदियों को देख घर में है आवाज लगाती
मां आकर कोठे में सभी को पैरा भूंसा पानी दे जाती
गोधूलि बेला की घड़ियां संध्या का एहसास कराती
तब तुलसी चौंरा पर जाकर मां अगर,दीपक है लगाती
बापू को सांझ को काम से लौटते देख मुनिया मुस्काती
बापू के झोले को झट से पकड़ कर वह जलेबियां निकालती
बड़े बुजुर्गों की ठिठोली दिन भर की थकान को मिटा जाती
बैठकर परिजन के साथ जब चाय की चुस्कियां मिल जाती
पढ़ाई लिखाई के लिए माएं बच्चों को आवाज लगाती
जिंदगी से जुड़े कुछ सबक भी अपने बच्चों को सिखाती
रसोई घर में चूल्हे से उठते धुंए और भोजन की महक भी
तब घर के लोगन की भोजन की क्षुधा भी है बढ़ाती जाती""
यह पारिदृश्य ग्रामीण क्षेत्र पर आधारित है
बरदीयों- पशुओं का समूह
कोठा- गौशाला

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