बेपरवाह सी ये नादानियाँ बचपन की मनमर्जियां
मंद मंद मुस्काते हैं जब ये नजरें चुरा हमसे
कर जाते हैं कुछ शैतानियाँ बनाते हैं कहानियाँ
खफा खफा से हो जाते हैं ये नन्हें मुन्हें जब हमसे
याद आती इनकी बदमाशियाँ और गुस्ताखियाँ
हर शख्स लगता अपना सा, ना ही कोई बेगाना
गुजर गया वो वक्त लगता था जो खुशियों का खजाना
कभी अपनों से रूठ जाना तो कभी परायों को मनाना
ना ही थी कोई चिंता ना ही था गमों का कोई ठिकाना
याद आता हैं हर पल, बचपन का वो वक्त सुहाना
जो जिया था बचपन बेफिक्र हो
अगर वो लौट आये जीवन में वापिस
ना करूं मैं फ़िक्र आने वाले पल की
लेकर आ जाऊं लबों पे मुस्कान उनके
रूठ गये जो जीवन के कश्मकश से
समेट लू उन लम्हों को दामन में अपने
बह ना जाए ये पल वक्त के दरिया संग
जो जिया था बचपन बेफिक्र हो
अगर वो लौट आये जीवन में वापिस
देख बच्चों को यूं खेलते, आ जाता है याद बचपन का वो वक्त सुहाना
बिना मतलब के दोस्तों को सताना, कभी रूठना तो कभी मनाना
कर शरारत आंचल में माँ के छुप जाना, सबसे यूँ नजरे चुराना
लगता है मधुर बचपन का वो जमाना, होता हैं ये खुशियों का खजाना
देख बच्चों को यूँ खेलते, आ जाता हैं याद बचपन का वो वक्त सुहाना
कितने सुहाने होते थे दिन वो बचपन के
ना होती कोई फ़िक्र ना कोई जिम्मेदारी
सुबह शाम बस आते नजर खेल खिलौने
जो ना होती कोई पूरी जिद हमारी
समय बिताते सारा रूठने मनवाने में
हो जाता जब मनचाहा झूम जाते आंगन में
बिखेर खुशियाँ हर ओर लाते लबो पे मुस्कान
कितने सुहाने होते थे दिन वो बचपन के
याद आता है अब वो बचपन का जमाना
हर पल लगता था खुशियों का खजाना
हर कोई होता था हमारी नादानियों का दीवाना
ना होती रोने की वजह ना हंसने का बहाना
मंद मंद मुस्कान लिए सदा माँ को सताना
कभी रूठना तो कभी मनाना
याद आता हैं अब वो बचपन का जमाना

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