तेरे आंगन की मैं
सोन चिरैया बाबुल
दो दिन का रैन बसेरा
भोर हुए उड़ जाना रे
रो रो कर अंखियों से
आसुं बहे तुझको भी
बाबुल खूब रुलाना रेे
तुझ संग मेरी प्रीत बंधी
फिर क्यों ऐसी रीत बनी
जिस आंगन में जन्म लेकर
खेली कूदी पली बढ़ी मैं
पल में तोड़कर बन्धन सारे
क्यों मुझे पराया बना दिया रें
जिस ऊंगली को थामकर
पहली बार पैरो चली मैं
उन्हीं हाथों ने मेरा हाथ
गैरों के हाथों में थमा दिया रे
तेरे आंगन की कलियां को
अजनबी बगिया में खिला दिया
छूट गया बाबुल अंगना तेरा रे
सजना के घर की तकदीर बनी
दुल्हन बन सज धज कर
खड़ी तेरी देहरी पर बाबुल
अंगना को निहारू घड़ी घड़ी रे ।।
नेहा धामा " विजेता " बागपत , उत्तर प्रदेश

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