पैदा   हुई   तो   माॅं  का  आंगन  देखा 
मेरी किलकारियों से आंगन गूंज उठा 
बचपन उसी आंगन में बीता 
संग हमारे कितनी खुशियां लाया 
जवानी आई आंगन भी 
हमारे साथ - साथ ही मुस्कुराई 
एक दिन जीवन में ऐसा भी वक्त आया 
उसी आंगन में सात फेरे लें 
मुझे मेरे माॅं - बाप ने 
‌अपने जिगर के टुकड़े को 
किसी और आंगन में 
जाने के लिए विदा कराया 
किसी और के आंगन की
 इज्जत तो मैं बन गई 
पर इस आंगन ने मुझे
 पूरी तरह नहीं अपनाया 
यह भी मेरे लिए वही
 पुराना आंगन‌ ही था 
पर इस आंगन में मेरा 
 खिलखिला कर हॅंसना 
जोर से  बोलना  तक मना था 
आंगन को मैं क्या दोष दूं 
लोगों की दकियानूसी सोच का 
यें  सब जो  असर    था ।
सोच का असर आंगन भुगत रहा था 
मैं तो हूॅं सबके लिए एक-समान 
फिर यें भेदभाव मेरे इस 
आंगन में क्यों हो रहा 
मन ही मन में आंगन 
ऐसी बातें सोच रहा ।


                          धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻

" गुॅंजन कमल " 💓💞💗