सुंदर सुसज्जित प्रकृति सा आंगन, नन्ही संध्या - दीप मैं
 नेह बिन बुझती सी बाती, कैसे कुछ रचना रचे? 

है असीमित गगन आगे,पृष्ठ केबल क्षितिज कोर
 पथ मध्य, पथिक थके हैं, दिखे ना पथ का कोई छोर
विकल प्यासा, जल की आशा, मिले केवल ओस भोर

 तीव्र हो चली गति जीवन की, अनुभव रहे अधूरे से 
 रोज मिलते अनजान चेहरे, है भले हम उम्र से 
 मगन - मस्त सब व्यस्त खुद में, यहाँ कौन किसकी सुने? 

 ज्योति  ज्यों- ज्यों बढ़ती जाए , तम भी उतना ही घिरे
शूल हो सब फूल ऐंठे, राई बन पर्वत अड़े
श्रम,विवेक, सुकाम बिन क्या सीप मोती से मिले? 

 ढूँढूँ स्नेह सदैव सबमें, हर बार जाऊँ हार मैं
  बढ़े पग  अवलंब हेतु, घिरते मगन मझधार में
 रहूँ जहाँ कहीं, सदा सत्य यही, है सह- अस्तित्व संघर्ष और  मध्य मेरेl


निगम झा
स. उप निरीक्षक, स. सी. बल
सिलीगुड़ी