ठाकुर साहब अपनी बहू के हाथों लिखे खत को पढने लगे।

  " आदरणीय पिता जी और माता जी 
                           सादर चरण स्पर्श।

  ईश्वर सभी को जीने के लिये सहारा देता है। पर किसी का सहारा देखने से अच्छा ईश्वर का सहारा ही देखना ठीक है। उसी आध्यात्मिक अबलंबन के आधार पर मैं कुशल से हूं। उम्मीद करती हूं कि आप भी कुशल से होंगें।

   आज तक जिंदगी में अच्छे और बुरे अनेकों पल आये। पर कभी भी खुद को कमजोर नहीं पड़ने दिया। इस बार भी अनेकों दुखद घटनाओं को अपनी आंखों से देखा। एक बार तो यही लगने लगा कि वास्तव में यह संसार ही धोखा है। फिर संसार में जीवन जीने के लिये केवल तटस्थ रहना ही ठीक है।

   तटस्थता को मैंने अपनाना चाहा पर पूरी तरह अपना नहीं पायी। जीवन में एक रिश्ता ऐसा बन चुका है जिससे तटस्थ नहीं हो पायी। शायद आज तक मैं उसी प्रेम रूपी रिश्ते को अपनाकर जीवन समर में आगे बढने की शक्ति पा रही हूं। यदि उसी रिश्ते से तटस्थ हो जाऊंगी तो फिर आगे बढ ही नहीं पाऊंगी।

  केवल सांसो का बंद हो जाना ही मृत्यु नहीं है। अनेकों बार मनुष्य श्वास लेते हुए भी जीवित नहीं होता है।

  सारे रिश्तों के अंत के बाद भी प्रेम का रिश्ता रहता है। क्योंकि प्रेम ही सभी रिश्तों का आरंभ है।

   पिता जी। अधिक ज्ञान की बातें लिखने से क्या फायदा। सत्य है कि मैं अपना मार्ग भूल चुकी थी। पर मैं सही राह पर आ गयी। आखिर मैंने प्रेम जो किया है। मेरा प्रेम मुझे कभी भी भटकने नहीं देता है। विभिन्न तर्क वितर्को के बाद भी मैं अपने प्रेम की बात को ही मानतीं हूं तो यह निश्चित ही हमारे प्रेम की जीत है।

   पिता जी। वैसे तो संसार में सभी के जन्म का कारण उसके मात्र पिता होते हैं। मेरे भी जन्म का कारण मेरे माता पिता ही हैं। संतान चाहकर भी कभी अपने माता पिता के ऋण से मुक्त नहीं हो पाती है।

  निश्चित ही मैं आज भी खुद को उस ऋण से मुक्त नहीं मानती। पर लगता है कि शायद अभी तक मैं उस ऋण को गलत तरीके से चुका रही थी। अकर्मण्यता को प्रोत्साहित कर रही थी। यह मेरी ही भूल थी कि एक युवा पति पत्नी अपना जीवन यापन के लिये धोखाधड़ी के मार्ग पर अग्रसर हुए। यह मेरी ही भूल थी कि मेरे माता पिता भी उस गलती में उनके साथी बन गये। वास्तव में ऋण संस्कारों का होता है। संस्कारों के ऋण को कभी भी धन दौलत से चुकता नहीं किया जा सकता है।

   आज तक वास्तव में धोखे में थी। आज तक मैंने अपना पितृ ऋण चुकाया ही नहीं है। अभी तक मैं एक सामाजिक बुराई को ही प्रोत्साहित कर रही थी।

   मुझे लगता है कि यदि मेरा भाई अपने कर्तव्यों के प्रति गंभीर हो जाये, तो निश्चित ही मेरा वह ऋण पूर्ण हो जायेगा।

   पिता जी। आपको बताना है कि सेना से रिटायर्ड होने के बाद अब मैं पुलिस विभाग में नौकरी कर रही हू। आपको अपना नया पता भी लिख रही हूं।

   प्रवेश की अध्यापिकाएं उसकी बहुत तारीफ करती हैं। वह निश्चित ही अध्ययन में गंभीर है। अध्ययन ही नहीं, अपितु वह जीवन जीने के तरीकों में भी गंभीर है। इतनी छोटी आयु में वह अपने संस्कारों से चकित कर देता है। उसकी जीवन शैली बहुत मुझे अपने पति की याद दिलाती है। 

   पिता जी। मै किस जाति में पैदा हुई हूं, यह मेरा दोष नहीं है। आपने मुझे अभी तक स्वीकार नहीं किया है, यह भी मेरा दोष नहीं है। फिर भी मैं दोषी हूं। मैं दोषी हूं क्योंकि मैंने अपने पति को किया वायदा कुछ समय के लिये भुला दिया।

   वैसे झूठ बोलने के लिये अनेकों तरीके हैं। कहा जा सकता है कि नयी परिस्थितियों में समय ही नहीं मिला। जिंदगी की भागमभाग में मैं खत लिखना भूल गयी ।

   झूठ की बुनियाद पर पवित्र रिश्तों की नींव नहीं रखी जाती है। ससुर और पुत्रवधू का रिश्ता तो पिता और पुत्री के रिश्ते के समान ही पवित्र होता है। 

   पिता जी। एक सत्य है कि थकान अनेकों बार शारीरिक नहीं होती है। मानसिक थकान बहुत बार शारीरिक थकान से भी बढकर होती है। 

  सत्य है कि अब मैं थकने लगी हूं। सत्य यह भी है कि अब मुझे भी भावनात्मक सहारे की आवश्यकता है।

   सत्य बात यही है कि केवल कर्तव्यों को पूर्ण करने से ही कर्तव्य पूर्ण नहीं होते हैं। अधिकार और कर्तव्यों का संतुलन ही अधिकार और कर्तव्य दोनों का अस्तित्व बनाये रखता है। अन्यथा दोनों का ही अंत हो जाता है। 

  प्रेम के राह पर चलते चलते आज तक मैं केवल कर्तव्यों को ही ध्यान देती आयी हूं। शायद यह गलत तरीका रहा है। मैं राजीव की अर्धांगिनी हूंं। आपकी पुत्रवधू भी हूं। इन कर्तव्यों की पूर्ति के लिये अब मैं अपने अधिकारों की याचना कर रही हू। 

   अपने बुजुर्ग सास ससुर की सेवा करना पुत्रवधू का कर्तव्य है। शायद इससे आगे पुत्रवधू को अपने सास ससुर की सेवा का अधिकार है। 

  बुजुर्गों से भावनात्मक लगाव केवल संतान का कर्तव्य ही नहीं है अपितु अधिकार भी है। 

   पिता जी। मैं सचमुच गलत थी। आज तक अपने अधिकार से मुंह मोड़ती आयी हूं। पर अब नहीं। मुझे अब अधिकार चाहिये। अपने सास ससुर के स्नेहहस्त मुझे अपने सर पर चाहिये। उनकी सेवा का अधिकार चाहिये। 

   अधिकार तो मेरे पुत्र प्रवेश के भी हैं। अपने दादा और दादी के प्रेम पाने के अधिकार से उसे बंचित नहीं रहना चाहिये। 

  यह सत्य है कि प्रेम मार्ग में चलता साधक असाध्य को भी साध्य कर लेता है। यदि मैंने सच्चे मन से राजीव को प्रेम किया है, आज भी उन्हीं को प्रेम करती हूं तो वही प्रेम मुझे मेरे अधिकारों की प्राप्ति कराये। मेरे और मेरे पुत्र के अधिकार के मध्य आने बाली ऊंच और नींच की दीवाल को मेरा प्रेम ध्वस्त कर सके। 

   आपके उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी। अन्यथा जल्द अवकाश लेकर आपसे मिलने आऊंगी। 

                आपकी धर्म की पुत्री संध्या 

               *****************'*****
              (संध्या का वर्तमान पता) "

  
   पत्र पढकर ठाकुर साहब की आंखों में आंसू आ गये। आज उन्हें संध्या के अधिकार का स्मरण हुआ। संध्या को और प्रवेश का उसका अधिकार जरूर मिलेगा। प्रेम अनेकों दीवारों को तोड़ चुका था। समाज की जंजीरों को काट चुका था। अपना रूप का विस्तार कर चुका था। अब वही प्रेम ठाकुर साहब और जानकी देवी के मन में अपनी धर्म पुत्री संध्या के लिये जग चुका था। निश्चित ही अब उनका उस प्रेम की आवाज को अनसुना कर पाना असंभव था। 

  अपनी धर्म पुत्री के लिये उठे पवित्र प्रेम ने सबसे पूर्व उनके मन से छोटे भाई के प्रति द्वेष को बहा दिया। ठाकुर साहब और जानकी देवी आज अनेकों वर्षों बाद अपने छोटे भाई के घर चल दिये। जल्द ही वह अपनी धर्म की पुत्री से मिलने जायेंगें। उसे उसका अधिकार प्रदान करेंगें। 

क्रमशः अगले भाग में 
 दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'