हल्के से भी पदचाप की भी
आहट होती हैं।
परदा भी गिरे तो
आँखे चौक जाती हैं।
कितने सलीके से
टूटता है दिल,
ना कोई आहट होती हैं।
ना आँखे चौकती हैं।
प्रेम तो सभी करते हैं
हर प्रेम में चाहत नही होती,
बूंदे तो लाखों गिरती है हैं।
हर बूँद सीप में
गिरकर मोती नही होती।
इबादत के लिए तो उठते हैं
लाखों हाथ,
किसी ग़ैर की मदद को उठे,
हर हाथ में वो ताकत नही होती।
आँखे तो सभी के पास हैं,
सुरमें से है सजती।
ग़ैर की पीर में अश्रु से सजे
आँखे ऐसी सभी की नही होती।
गरिमा राकेश गौतम
खेड़ली चेचट कोटा
राजस्थान

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