मयखाने में सरेराह चले जाते हैं
सारी चिंताओं से जैसे मुक्त हुए जाते हैं
क्या चिंताओं को चिता बनाने का मार्ग अपनाते हैं
ना ज़मीर आगे ना ही जीवन जागे
अपनों का भी जीवन नर्क बनाते हैं
जीते जी आग के हवाले कर जाते हैं
सिगरेट शराब चरस गंजा
अमृत समान समझ क्यूँ बैठे हो
लत इनकी ऐसी बुरी
स्वयं को ही दीमक बना डाले हो
ना मोक्ष मिलेगी ना मुक्ति
दर्द के अलावा नहीं है ये कोई सूक्ति
मुक्ति के माने बहुतेरे
एक आता नशा मुक्ति भी
एक समय ऐसा आएगा
दर्द ये दिल दहलाएगा
अँधेरे को ही गले लगाएगा
रौशनी देख भय समाएगा
आगे बढ़ें जिंदगी को गले लगाएं
अहसासों को दिल में जगाएं
आओ वफ़ा जिंदगी से करते हैं
घर समाज देश को जगाते हैं
नशा मुक्त समाज हो हमारा
अभियान मिल एक चलाते हैं
आरती झा(स्वरचित व मौलिक)
दिल्ली
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