अनेक चेष्ठाओं से ग्रसित मन को
न सत्कर्मों की बेल बढ़ रही
सब्ज़बागी दुनिया सिर्फ अपने ही स्वार्थ गढ़ रही
इंसानी भावनाओं का पड़ा घोर अकाल
कलयुग में एक दूजे पर व्यंग कस हो रहे हैं बेहाल
मुक्ति पतवार ना कोई चलाना चाहे
बिना ईश भक्ति के वैतरणी फिर कौन पर लगाये
मोह माया के बंधनों में उलझ अधर्म कृत करते हो
परमपद का जब लोभ ही नहीं तो एक सौ आठ क्यूँ जपते हो
दुर्बल तन ले उतरते बेरा में कहां ले पाओगे हरि का नाम
परम तत्व में विलीन होने के लिए ले कर ले कुछ सार्थक काम
दुविधा अदुविधा में भटक रहा कहलाते हुए बुद्धिमान इंसान
आखिर क्यूं नहीं कर पाते अपने ही सार्थक उद्देश्य की पहचान
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