वो बचपन के दिन वो नादान हरकतें,
वो मदमस्त हंसता खिलखिलाता हंसी बचपन,
खेल खेल में मस्ती वो दिल आवारा,
वो छोटी-छोटी बातों पर रूठ जाना,
वो मां का प्यार से मनाना,
वो पापा के साथ घूमने जाना और दोस्तों के साथ मौज मस्ती,
वो एग्जाम का डर फिर रिजल्ट से घबराना,
ना कुछ पाने की आशा ना कुछ खोने का डर,
बस अपनी ही धुन अपने सपनों का घर,
ना रोने  की वजह ना हंसने का बहाना,
कितने प्यारे होते हैं वो दिन जिसमें खिला रहता हमेशा मन,
खेलकूद में बीत जाता सारा दिन,
यादों की धुधं में बचपन की गलियां जहां बीते जमाने,
बहुत याद आते हैं वो बीते जमाने, सब कुछ मिल जाएगा जिंदगी में,
पर वो दिन वापस नहीं आएंगे।

प्रिया धामा
भिलाई, छत्तीसगढ़