भुलाए नहीं भूलती, कहानी बचपन की 
होठों पर बिखेरती मुस्कान, शैतानियां बचपन की

बन्दर की तरह उछलते कूदते रहते थे
पीट जाते थे ,फिर भी हँसते रहते थे

स्कूल नहीं जाने के, नित बनाने नए बहाने
स्कूल समय खत्म होते ही, खुशी से लगते चिल्लाने

भाई बहनों से बात बात, पर लड़ना झगड़ना
समझदार क्या हुए अब, हर बातों के लिए तरसना

डाकिए की साइकिल ले, मोहल्ले के चक्कर लगाना
घर पे पड़ती डांट फिर भी, हँस्कर सब सह जाना

न मार की चोट लगती थी ,न बातों की ही लगती चोट
अब जरा जरा सी बात पर
भावना को लगती ठेस......
                             नेहा शर्मा