भारतीय परंपरा में जब कोई बालक विद्याध्ययन का आरंभ करता है, उसी समय विद्या की देवी माता सरस्वती की आराधना की जाती है। विद्या की देवी से प्रार्थना की जाती है कि वह बालक पर अपनी कृपा रखें।
जिस डाल पर खुद बैठा था, उसी डाल पर काट रहे मूर्ख का विवाह अपने युग की सर्वोच्च विदुषी कन्या के साथ धोखे से रच दिया गया। पर धोखा कितने दिन टिकता। विवाह के कुछ समय बाद ही धोखे का पता चल गया। विदुषी पत्नी ने मूर्ख पति को घर से बाहर निकाल दिया।
वैसे भारतीय परंपरा में वर्णित नारियों के कर्तव्यों की परिभाषा के अनुसार यह कोई अच्छा कृत्य नहीं माना जाता है। पर एक सत्य यह भी है कि अति विशिष्ट को जन्म देने के लिये कुछ अलग ही किया जाता है।
माता सरस्वती की आराधना कर उस युवक ने खुद को पूरी तरह शिक्षण में लगा दिया। निश्चित ही अनेकों परेशानियां आयीं। उसे कोई भी विद्वान पढाने को तैयार न था। पर खुद स्वाध्याय से शिक्षण कर वह मूर्ख बहुत बड़ा विद्वान बना। कालिदास बनकर जब वापस अपनी पत्नी विद्योत्तमा के घर आया, उसी समय विद्योत्तमा द्वारा दी गयी चुनौती पर कार्य किया। अस्ति कस्चित वागविशेषः तीन शव्दों पर तीन प्रसिद्ध काव्यों कुमारसंभवम्, मेघदूतम् और रघुवंशम् की रचना की।
सच्ची बात तो यह है कि विद्या प्राप्ति के लिये लगन, एकाग्रता, अभ्यास अधिक आवश्यक है। जहाँ लगातार अभ्यास से एक मूर्ख कालिदास बन गया। वहीं सरस्वती नाम से जानी जाती प्रेम की पत्नी का विद्या से बहुत थोड़ा संबंध था। बचपन से ही शौक मौज में रहती आयी, रईस परिवार की कन्या का पूरा का पूरा ध्यान श्रंगार में रहता। रूप से भी सुंदर थी। उस रूप को और अधिक सुंदर बनाये रखने में सक्षम थी।
माता, पिता द्वारा अध्ययन को भी गंभीरता से लेने की सलाह उसने कभी नहीं मानी। उसे तो पूर्ण विश्वास था कि एक दिन उसकी रूप माधुरी पर मोहित कोई राजकुमार खुद उसका हाथ थाम लेगा। उसका जीवन ऐश्वर्य से भरा रहेगा। उसके पास कभी किसी चीज की कमी नहीं रहेगी।
बहुत छोटी आयु से ही अपनी रूप माधुरी का सही प्रयोग करना वह जानती थी। नियमित विद्यालय वह इसी लिये जाती थी ताकि वह देख सके कि कौन कौन उसके रूप पर फिदा होता है। अक्सर किसी न किसी युवक की बाइक उसे विद्यालय पहुंचने का साधन बन जाती।
प्रमाणपत्र ही किसी की योग्यता का मापदंड माने जाते हैं। बोर्ड की परीक्षा से पूर्व उसे कभी भी कमजोर छात्रा नहीं माना गया। उसके परिणाम अच्छे रहते थे। पर सत्य यही था कि उसके परिणाम भी उसकी योग्यता को न देख उसके रूप से प्रभावित होते थे। पर हाईस्कूल की परीक्षा में उसकी रूप माधुरी काम न आयी। सरस्वती खुद अनुत्तीर्ण हो गयी।
अनेकों बार के प्रयास में जब हाईस्कूल की परीक्षा मात्र उत्तीर्ण की, फिर विद्यालय जाने की हिम्मत न हुई। विद्यालय छूटने का मात्र इतना ही दुख था कि अब उसका रूप प्रदर्शन बंद था।
निश्चित ही सरस्वती की अपने रूप के विषय में ली गयी धारणा सही थी। उससे विवाह के लिये दो युवक लालायित थे। हालांकि दोनों का अध्ययन लगभग पूर्ण था। दोनों ही अति संपन्न परिवार से संबंधित थे। दोनों को ही आज की परिभाषा में राजकुमार माना जा सकता है।
सरस्वती की पहली पसंद निश्चित ही प्रेम न था। दूसरे युवक से वह ज्यादा प्रभावित थी। हालांकि सरस्वती मात्र अपने शौक मोजों से प्रभावित थी। जो उसपर ज्यादा खर्च करेगा, उसी का नंबर लगेगा। इस तरह गुप्त मिलन कब तक चलता। वैसे भी समाज में एक बात चार होकर उठती हैं। सरस्वती भी विवाह के योग्य थी। उसी युवक के साथ उसका विवाह तय हो गया। पता नहीं कि ईश्वर का क्या विधान था कि चट मंगनी पट ब्याह की इच्छा होने पर भी ऐसा संभव न हो पाया। शायद सरस्वती के जीवन में उससे भी अधिक वैभव था। शायद सरस्वती की कल्पना से बहुत अधिक वैभव सरस्वती का इंतजार कर रहा था। प्रेम की नियुक्ति दिल्ली विकास प्राधिकरण में हो गयी। एक बार में ही प्रेम द्वारा प्रदत्त उपहार दूसरे युवक के उपहारों से ज्यादा कीमती सिद्ध हो गये। अब सरस्वती को उस युवक की जरूरत न थी। उसके प्रेम के बायदे व्यर्थ रहे।यदि मौके को भुनाना ही समझदारी है तो सरस्वती को निश्चित ही समझदार कहा जायेगा। इस तरह सरस्वती प्रेम के जीवन का हिस्सा बन गयी।
सरस्वती का जीवन निश्चित ही ऐश्वर्य का पर्याय बन गया। लगता है कि कुछ भी उसे अप्राप्त नहीं है। पर वास्तव में ऐसा नहीं है। गहराई से देखा जाये तो सरस्वती ने जितना पाया है, उतना ही खोया भी है। विवाह के बाद कुछ समय वह प्रेम के साथ सार्वजनिक समारोहों में भी जाती थी। प्रेम अपनी संगिनी की उसकी सुंदरता का संसार को परिचित कराता था। पर धीरे-धीरे समय बदला। भले ही रूप की अधिक पूजा होती है पर योग्यता की भी पूछ होती है। जब प्रेम के कुछ सहकर्मियों का विवाह ऐसी योग्य कन्याओं के साथ हुआ जो कि वास्तव में समाज में अपनी योग्यता से अपनी पहचान बना चुकी थीं , प्रेम ने समारोहों में अकेले ही जाना शुरू कर दिया। सरस्वती के साथ जाने में उसे लज्जा का अनुभव होने लगा।
योग्यता समय के साथ अनुभव प्राप्त कर और बढती है। समाज में अपनी प्रतिभा से अपना वर्चस्व स्थापित करने बाली स्त्रियों का सम्मान उनके पद बढते जाने से बढता ही है।खुद के साथ साथ वे अपने जीवन साथी के सम्मान का भी आधार होती हैं। जीवन साथी के साथ उनकी घनिष्टता बढती ही है। वहीं रूप धीरे धीरे नष्ट होता जाता है। रूप के आधार पर आरंभ हुआ प्रेम रूप के मंद होने के साथ साथ कम भी होता जाता है।
निश्चित ही सरस्वती अभी भी रूपवती है। सौदर्य संसाधनों का भी उपयुक्त प्रयोग करती हैं। पर अब वह पहली बाली बात नहीं है। दूसरी तरफ प्रेम भी चरित्र से उतना उज्जवल नहीं है। मन बहलाने के उसके पास भी साधन हैं। पति पत्नी और वो भी कहानी तो बहुत छोटी है। यदि सही कहा जाये तो पति पत्नी और वो अनेकों रमणियों की गाथा शुरू हो चुकी है।
वैसे बाहर प्रेम कितनी भी चरित्र हीनता का परिचय दे दे पर सामाजिक व्यवस्था में खुद को अच्छा दिखाने की मानसिकता के कारण ऐसी कोई संभावना नहीं है कि वह सरस्वती को अपने जीवन से अलग कर दे। सरस्वती को जिस ऐश्वर्य की चाह है, उसमें कोई कमी आयेगी, ऐसी कोई संभावना तो नहीं है। पर समय के साथ बहुत बदल जाता है। कभी कभी शौक मौज के लिये उठाये अमर्यादित कदम मनुष्य को कुछ भी अनुचित करने के लिये मजबूर कर देते हैं। कभी भी ऐश्वर्य का भवन धराशायी हो सकता है। किसी युवक को प्रेम में धोखा देकर सरस्वती ने प्रेम के जीवन में स्थान पाया था। उसी तरह एक अन्य धोखे का आरंभ हो चुका है। संभावना यह भी है कि कोई रमणी प्रेम को बाध्य कर सरस्वती को उसके जीवन से ही बाहर कर दे। धोखे के आरंभ का कभी भी धोखे पर ही अंत हो सकता है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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