दहलीज जो बाँधे रखती है 
स्त्री को मर्यादा मे
और साथ मे बाँध देती है
उसके सपनो को,उसके अरमानो को
जिन्हे उड़ने से पहले ही
काट दिया जाता है 

दहलीज जो बाँधे रखती है
उस स्त्री के चरित्र को
जो बाहर जाती है
अपने सपनो को साकार करने
लौट आती है सांझ ढले
अपनी दहलीज़ मे

दहलीज जो बाँधे रखती है
एक पुरुष को
उसकी जिम्मेदारियों से
और अहसास कराती है
उन कर्त्वयों का
जो परिवार के प्रति है

दहलीज जो बाँधे रखती है 
एक माँ के उन क्षणों को
जो उसी पर बैठ कर
उसने बिताएं है
उस बेटे के इन्तज़ार मे
जो बॉडर पर तैनात है

दहलीज जो बाँधे रखती है
कितने ही राज अपने सीने मे
और कितनी ही बातों को
रोकती है बाहर जाने से
और ढ़ाके रहती है
परिवार की इज्जत को

कविता गुज्जर