वात्सल्य का अनुपम उदाहरण है जगत में माँ।
सोए हुए शिशु को अति प्रेम से चूमती है माँ।
सो रहा आँचल में लिपट निरखती है वह उसे।
गा रही लोरी हो विह्वल कुछ और न सोचती माँ।
सपने लिए कुछ आँखों में उन्हीं का वह गान करती।
संतति के पूर्ण अस्तित्व को अपनी आंखों में समेटती।
प्रेम,ममता वात्सल्य हिलोरें उठ रहीं है हृदय में।
निश्चिंत हो सो रही संतति, माँ के आँचल को पकड़ती।
मैला हो जाएगा आँचल इसकी उसे चिंता नहीं।
बच्चे सोए सुख की नींद इससे बढ़कर कुछ नहीं।
सोचती है कि क्या करूँ जिससे सुखी संतान हो।
सारी विपदा मुझ पर आएं किन्तु संतान पर नहीं।
माँ की ममता की तुलना कोई शक्ति कर सकती नहीं।
गाथा लिखें तो थके लेखनी,स्याही पूरी पड़ सकती नहीं।
बुढ़ापे में करना सम्मान उनका जब वो थक चुकी हों।
उनके आशीर्वाद से बढ़ जन्नत की भी कोई नेमत नहीं।
स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'

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