होकर  सप्त  अश्वों वाले रथ पर  सवार,
नीले   अम्बर   और   बादलों   के   पार,
उषा संग  उदित  रवि दूर हुआ अंधकार,
कर्मपथ पर अग्रसर  प्रकाश के पारावार।

स्वर्णिम आभा से जिनका अनुपम श्रंगार,
मन को करे प्रफुल्लित शीतल मन्द बयार,
मन हर्षित  तन  नवल  चेतना का आगार,
तप और  त्याग मर्म ही है जीवन का सार।
 
तन रूपी  अम्बर में मन का सूर्य बसता है,
जिसमें अथाह शक्ति, ऊर्जा  ज्वलन्तता है,
तर्क-वितर्क  की अनगिनत  किरणें देता है,
अज्ञान तम दूरकर ज्ञान की रौशनी देता है।

राग-द्वेष का रोग मिटाकर निरोगी बनाता है,
निराश मन को आशाओं  के गीत सुनाता है,
अलौकिक  प्रकाश  से धरा का तम हरता है,
तभी तो वो तेजपुंज ज्योतिपुंज कहलाता है।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश "उरई"