इस बार भी संध्या को उसके खत का जबाब नहीं आया। अपने निश्चय के अनुसार वह गांव जाने की तैयारी करने लगी। अवकाश के लिये उसने आवेदन कर दिया। पर कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों में उसका अवकाश स्वीकृत नहीं हो पाया। संध्या इन परिस्थितियों को समझती थी। जानती थी कि नौकरी के साथ अपने पारिवारिक कर्तव्यों का निर्वहन कितना कठिन है। न तो विभाग की जिम्मेदारी छोड़ी जा सकती है और न ही परिवार की।
क्या कोई व्यक्ति इतना रूखा हो सकता है। उसने अपने ससुर जी को मनाने की कितनी कोशिश कीं। परिणाम हीनता धैर्यवानों के धैर्य को भी विदीर्ण कर देते हैं। ईश्वर से प्रार्थना के अतिरिक्त कुछ हो भी नहीं सकता था।
दूर की बात अलग है। यदि ससुर जी अपने सामने अपने नाती को देखेंगे तो निश्चित ही उन्हें अपने पुत्र का स्मरण हो जायेगा। पर यह भी आसान नहीं है। अवकाश स्वीकृत नहीं हुआ।
इन्हीं विचारों में संध्या एक दिन बैठी थी। शरीर के अनेकों वाम अंग एक साथ फड़कने लगे। मानों उसका इंतजार पूर्ण होने बाला हो। मानो कि उसे उसकी साधना का फल मिलने बाला हो। जिस प्रेम यज्ञ की साधना वह वर्षों से कर रही थी, उस यज्ञ का एक बड़ा फल उसे मिलने बाला है। शायद अब उसके जीवन में एक बार फिर से प्रेम का आगमन होने बाला है।
प्रेम नर और नारी, नायक और नायिका से ऊपर की अवधारणा है। प्रेम केवल पति और पत्नी के मध्य ही नहीं होता है। प्रेम माता पिता और संतान के मध्य भी होता है। धर्म के पिता और धर्म की पुत्री के मध्य का रिश्ता भी एक दिव्य प्रेम की ज्योति से जगमगाता है।
ठाकुर साहब ने जो निश्चय किया, उस निश्चय पर अमल करना कहीं से आसान न था। समाज के अनेकों लोग उनके विरोध में खड़े हो गये। मनुष्य को खुद के जीवन के फैसले लेना कहाँ आसान होता है।
समाज वास्तव में एक अपरिहार्य व्यवस्था है। जो मनुष्य को सही और गलत का विवेक देती है। पर जब वही व्यवस्था सही और गलत से हटकर केवल अहंकार प्रदर्शन का कारण बन जाये तो उस व्यवस्था का विरोध करना भी अनिवार्य हो जाता है। निश्चित ही यह बहुत कठिन काम है। पर ठाकुर साहब उस कठिन काम को करने के लिये दृढ़संकल्प थे। इस बार वह पूरी तरह अकेले नहीं थे।
श्री राम वनवास के लिये निकले तो लक्ष्मण ने उन्हें अकेले न जाने दिया। निश्चित ही वनवास की अवधि में अनेकों समस्या आयीं। पर छोटे भाई के साथ ने सभी समस्याओं पर विजय प्रदान करा दी। जब भाई भाई का साथ देता है, उस समय मनुष्य अनेकों आपदाओं से पार पा जाता है। ठाकुर साहब समाज के सामने अकेले न थे। उनके छोटे भाई का परिवार उनके साथ था।
ठाकुर साहब के दोनों बेटे और पुत्रवधू भी उनका विरोध करने आ गये। जिन्होंने कभी पिता की परेशानी न समझी, वे अपनी परेशानी का बढ चढकर बखान कर रहे थे। आखिर उन्हें अपने ही समाज में रहना है। बच्चे भी एक दिन बड़े होंगे। उनका विवाह भी करना होगा। अभी भी बड़े भाई साहब के कारण बहुत दिक्कत आयेगी ।पर कहा जा सकता है कि बड़े भाई साहब के कृत्य के बाद उनका सामाजिक वहिष्कार कर दिया गया था। पर जब पिता जी उन्हीं की विजातीय पत्नी के पास रहने जायेंगें तो समाज हम पर थूकेगा।
इस बार ठाकुर साहब न झुके। यदि वहिष्कार करने से ही समाज में सम्मान मिल जाता है तो वे अपने माता-पिता का वहिष्कार कर दें। वैसे भी माता पिता की उन्हें कौन सी चिंता रही है। मन से तो वहिष्कार बहुत पहले हो चुका है। कर्तव्य तो कभी ध्यान नहीं रहा। अधिकार की चाहत रखने बालों। अधिकार कोई संपत्ति का नहीं होता है। अधिकार होता है कर्तव्य का। यदि कर्तव्य नहीं तो अधिकार भी नहीं।
मनुष्य अकेला ही आता है और अकेला ही जाता है। बस संसार धर्म निभाने को अनेकों साथ मिल जाते हैं। यथार्थ में संसार में भी कितने साथ देते हैं। अधिकांश को तो साथ देते समय भी खुद का हित याद आता है।
नहीं। जो भूल की सो की। अब कोई भूल नहीं। अब बेटी को उसका अधिकार दूंगा।
सत्य है कि आज तक यमराज से मेरा संघर्ष इसी लिये था क्योंकि मुझे तुम पर कोई विश्वास ही नहीं था। अपनी जीवन संगिनी को तुम्हारे भरोसे कैसे छोड़ जाता। लगता है कि अब मेरा वह संघर्ष भी पूर्ण हुआ। मेरे बाद भी मेरी जीवन संगिनी का साथ देने बाली केवल संध्या बेटी ही है।
संध्या को खत का उत्तर न मिला। अब खत द्वारा उत्तर भेजने की आवश्यकता भी नहीं है। वह समय आ गया जबकि धर्म का एक पिता अपनी धर्म की पुत्री के समक्ष अपनी संवेदनहीनता की मांफी मांग रहा था। एक धर्म की पुत्री एक बार फिर से अपने धर्म के पिता को सहारा दे रही थी। सारे दोष समय पर देकर उन्हें समझा रही थी।
आखिर आज संध्या की वर्षों की साधना सफल हुई। प्रेम ने अपना लक्ष्य पा लिया। हालांकि एक लक्ष्य की प्राप्ति के साथ ही अगला लक्ष्य सामने होता है। जिस तरह आज ससुर और सास का स्नेह उसे मिला है, संभव है कि किसी दिन माता, पिता, भाई और भाभी को भी रिश्तों की अहमियत समझ आये। संभावना है कि किसी दिन अधर्म के पथ पर चलते संध्या के अपने उस अधर्म की तीक्ष्ण धूप से विचलित हो धर्म की छाया की तलाश करें। हालांकि लगातार गलत मार्ग पर चलता मनुष्य गलत को सही मानता है। फिर भी एक उम्मीद है कि कभी उसके मन में सही और गलत का भेद स्पष्ट हो जाये।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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