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जीने का हमें अधिकार है, पर इसका मतलब यह तो नहीं।
घर अपना ही आबाद हो , क्या मुफ़लिस को यह हक नहीं।।
जीने का हमें अधिकार है----------।।
हम मर्ज कहे अपना हक से, हम दर्द सुने औरों का भी।
यतीम है तो क्या हुआ, क्या उसको घर की जरुरत नहीं।।
जीने का हमें अधिकार है ---------।।
हम पूजा करें अपने रब की, मांगे मिन्नत अपने सुख की।
चाहे मजहब हो उनका अलग, क्या उनका कोई ईश्वर नहीं।।
जीने का हमें अधिकार है ----------।।
ये बच्चे है तो क्या हुआ, ये ही तो देश का भविष्य है।
क्यों सच छुपाते हो इनसे, क्या इनसे अपना वजूद नहीं।।
जीने का हमें अधिकार है -----------।।
जीवन अगर नहीं दे सकते, बर्बाद करें क्यों औरों को।
आजाद है सब जीने को यहाँ, इंसान एक तुम ही तो नहीं।।
जीने का हमें अधिकार है----------।।
जलने दे सबके घर का चिराग, हर बाग को हम महकने दे।आपस में हैं हम भाई भाई ,यहाँ कोई अपना दुश्मन नहीं।।
जीने का हमें अधिकार है ------------।।
रचनाकार एवं लेखक-
गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद
जिला- बारां(राजस्थान)

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