दसों दिशाएँ धुआँ - धुआँ हैं ।
आगे - पीछे , ऊपर - नीचे , 
प्रदूषण का अँधा कुआँ है । 
दसों दिशाएँ धुआँ - धुआँ हैं ।

प्रकृत्ति - प्रकोप नहीं प्रदूषण , 
जन - जन जिम्मेदार हुआ है । 
स्व कृत्यों पर नहीं नियन्त्रण , 
वायु - प्रदूषण बढ़ा हुआ है । 
जीवन के लिए खतरे का निशां है  ।
दसों दिशाएँ धुआँ - धुआँ हैं  ।

ऐ हवाओं गति कुछ तीव्र कर दो ।
ठहरा मेघ - धुआँ छितरा दो । 
कुछ विशुद्ध वायु प्रेषित कर  , 
अवरुद्ध श्वास में श्वासें भर दो ।
जन - जीवन अस्त - व्यस्त हुआ है ।
दसों दिशाएँ धुआँ - धुआँ है ।

ऐ जलद जल इतना बरसा दो ।
धूल - धुएँ का अस्तित्व ही मिटा दो ।
शुद्ध वायु संचारित करके , 
खग - चर - मनुज की श्वासें लौटा दो ।
मानव - मन कितना त्रस्त हुआ है ! 
दसों दिशाएँ धुआँ ही धुआँ हैं ।

मीरा सक्सेना माध्वी 
नई दिल्ली