🌹🌲🌹🌲🌹🌲🌹🌲🌹🌲🌹🌲🌹🌲🌹🌲🌹🌲🌹
मिटने लगा है धर्म इस पावन धरती से 
हर तरफ पाप बढ़ने लगा है
नहीं रहा जैसे जिन्दा इंसानियत इस ज़मीं पे
हर जगह अत्याचार बढ़ने लगा है
जिसकी आँचल में जन्म लेते है
उसी नारी को भरी समाज में सताने लगे है
नहीं बचा जैसे दिलो में निस्वार्थ प्रेम
हर कोई नफरत की आग में जलने लगे है
जिस धरती को सिंच कर रत्न उगते थे
अब चिर कर सीना धरा की ज़हर बोने लगे है
बरसता था आसमान से अमृत ज़मीं पर कभी
रंगी रहती थीं हरियालियो से आँचल ज़मीं की
बरसने लगा है जैसे अँगारे अब आसमान से
अब जहाँ देखो वहाँ ज़मीं पर सुखाड़ पढ़ा है
जहाँ बहा करती है पवित्र गाँगा प्यार की 
वही दुनिया शराब की दरिया में डूबने लगे है
हर ज़ुल्म सहती है इस दुनिया की 
होठों से उफ्फ तक ना करती है
जैसे चाहा इंसान वैसे ढलती गयीं
किसीने मंदिर बनाया ईश्वर की
तो किसीने पृथ्वी के पवित्र आँगन में
जाने कितने ही मयखाने खोल दी
जिस धरती ने किसी से कोई भेदभाव नहीं कि
वही इंसान ने अपने स्वार्थ में
ज़मीं को ही कयी हिस्सों में बाँट लिया
बन गया जाती का करोडो प्रथा
कुछ कज़ाग के टुकड़े के लिए
भाई ने ही अपने भाई का गला काट दिया
नहीं बचा भक्ति अब हर दिलो में
भगवान की जगह लोग नेताओं को पूजने लगे है
शायद यही वजह है नाश होना संसार का
जो तरह तरह की प्रदूषण फैलने लगी है
जिस पृथ्वी पर देवी देवताओं ने कभी 
प्रेम और मानवता का धर्म स्थापित किया था
वही पृथ्वी अधर्म और नफरतों के बोझ तले दबने लगी है...!!
🌹🌲🌹🌲🌹🌲🌹🌲🌹🌲🌹🌲🌹🌲🌹🌲🌹🌲🌹
नैना... ✍️✍️✍️