स्वार्थ का इससे बड़ा नहि होता कोइ उदाहरण ,
खुद की नजरो मे बन कर वो एक फरिश्ता होता है,
प्रेम की आड मे जब कोई जिस्मानी रिश्ता होता है, ।
प्रेम एक अनमोल निधि है, जहां नही होता दर्पण
रंग रूप का मोल न होता, दिल से होता है अर्पण
पाने की जब चाह न होती , त्याग यथावत रहता है.
ऐसा प्रेम सुरभि बन जाता , अमर जहां मे रहता है,
पर , इसके विपरीत जहा जिस्मानी रिश्ता होता है,
आकर्षण मिट जाता फिर गंदीनाली मे बहता है. .
बेशक, है अधिकार प्रेम का हर प्राणी भी करता है.
मिट जाता है द्वेष आपसी , जहां समर्पण रहता है. .

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