वो इस क़दर अपनी यादों का पाबंद कर गया,,,
मैं  चल  रहा  था होल होले अपनी ज़िंदगी वो
एक  झटके  में,,मेरी  चाल  बुलंद  कर  गया,,,

पता नही मेरे लिए क्या आग थी,,, उसमें,,
मैं अपनी रफ्तार से बुझ रहा था,,,कहीं से आया,,
और मेरे दिल के चरागों को रोशन कर गया,,,

इश्क़ की ख़ामोशी में रह कर,, ख़ुद में हार बैठा था
उसके इक अल्फ़ाज़ ने क्या जादू किया,, जो इश्क़
खातिर फ़िक्र मंद कर गया,,,

दुनियां के झमेलें कुछ इस क़दर छा गए थे,,,
दिल पागल सा हो गया था,,कुछ तो बात थी,,
उसमें  यारों  जो  इस  नासाज  दिल को,,,
दानिशमंद कर गया,,,

चाहें दुनियां बदल ले कोई भी पैंतरे,,,मुझे लेकर,,
मैं अब उसका हूं और ताउम्र उसी का हूं वो अपनी
हर अदा से अपना कर गया,,,

                                      कुमार