दहलीज के पार बांँह फैलाए सपना मिला
आँखों ही आँखों में आमंत्रण उसका मिला
मोहब्बत में पगा मन गुलजार यूँ होने लगा
हमदम ने हाथ थामा सारा जमाना मिला
दहलीज के आर पार खड़े हैं हम दोनों
दहलीज पार कर जाने कब मिलेंगे हम दोनों
हाथों में हाथ लिए इश्क के अपना बनने की
दहलीज को ही गवाह बनाएंगे हम दोनों
उर उटज ने बना लिया है जो दहलीज
मोहब्बत का पहना दिया है हमें ताबीज
ओस की बूँदों सा है इश्क का एहसास
मिले जा तेरा साथ ना करूँ मैं तजबीज
प्रीत के दहलीज पर टकराया है ये मन
एक साथ पग उठे बन गए जो हमकदम
मलंग बन उड़ता जाए अब मन का पतंग
जिंदगानी बना सात रंगों से सजा धनक
आरती झा(स्वरचित व मौलिक)
दिल्ली
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