ख़्वाब था के तेरे साथ ,
        एक ख्वाबों का शहर बसाऊँ।
कितनी भी मुश्किल हो मंजिल ,
          बस साथ तुम्हारे पाऊँ।

जितने भी रंग हो जीवन मे ,
                उनमें मैं रंग जाऊं।
हो सतरंगी जीवन तुम संग ,
               तितली सी इतराउं।

महकू सदा इत्र सी जब ,
             मैं पास तुम्हारे आऊं।
आंखों में भर लूं तुमको ,
         और दिल मे तेरे बस जाऊं।

दुनिया के मेले में मैं,
          बस तुम संग ही खो जाऊं।
दुनिया रहे खोजती मुझको,
           मगर नजर न आऊं।

पर देखो न ख्वाब ख्वाब था ,
                    पूरा कैसे होता?
कैसे मैं होती तेरी ,
                 और तू मेरा होता?

टूट गया है ख़्वाब और ,
           ख्वाबों का शहर भी छूटा।
ताने वाने हुए खाक ,
             और दिल भी मेरा टूटा।

चलो छोड़ो नए ख्वाब लेकर ,
                   हम कल फिर आएंगे।
फिर साथ तुम्हारे ख्वाबों का ,
                     शहर हम बसायेंगे।

इंदु विवेक उदैनियाँ
उरई( जालौन)
उत्तर प्रदेश