बच्चों को बचपन की उड़ान दे दो,
मज़दूरी रोक उनके चेहरे पर मुस्कान दे दो,
मन ही मन ये बच्चे भी किताब मांगते हैं,
हर रोज़ ही इस जहां से जवाब मांगते हैं।
ये कैसी गुमनामी के हमारा देश पनप रहा है,
किताब वाले हाथों में ईंट, पत्थर थमा रहा है,
मासूम सा बचपन है वो,जिसे मां के आंचल में खिलना था वो गुमनाम अंधेरों में खोता जा रहा है,
बचपन क्या होता है उसे आज तक मालूम नहीं,
जिस मैदान में खेलना था उसको साफ़ करना ही अपना जीवन बना रहा है,
मत करो इस कोमल हृदय पर इतना अत्याचार,
नहीं सह पाएंगे बजरी और कंकर की मार,
बड़ी हसरतें हैं उनकी भी जिंदगी में कुछ कर गुजरने की,
पर हर दिन में भूख और प्यास मजबूर कर देती है बोझा ढोने को,
बाल मज़दूर मजबूर हैं लेकिन मजबूत नहीं,
चारों पहर कमा रहा, सिर्फ एक पहर ही खा रहा।
उसे भी पढ़ना लिखना, सपने सजाना अच्छा लगता है,
रोज़ शाम पार्क में खेलने जाना अच्छा लगता है,
मज़बूरी ने कर दिया वक्त से पहले बड़ा,
वरना सिर पर किसको बोझ उठाना अच्छा लगता है।
बालश्रम से हमारी मानवता का हनन हो रहा है,
कैसी गुमनामी के अंधेरे में हमारा देश खो रहा है।
"जहां बच्चे ही चिराग है वहां यह कैसा अंधेरा गहरा रहा है,
जहां बच्चे चिराग है वहां यह कैसा अंधेरा गहरा रहा है।"

प्रिया धामा