स्कुल की चारदीवारी के 
बाहर मायूस खड़ी एक 
नन्ही सी जिंदगी सोच 
रही हैं पढ़ते बच्चों को 
देख रही हैं आते हैं 
ख्याल मन में क्या क्या
अपनी लाचारी पर 
सोच रही हैं मैं किस तरह 
गरीबी की जंजीरों को तोड़ 
शिक्षा की धरती पर खुले
 गगन में विचरण करू 
बेबसी भरी नजरों से 
क्यों देखूं सबकों 
हौसलों के पंख लगाकर 
सफलता की ऊंचाइयों 
तक उड़ान भरू 
मिटा कर सारे भेदभाव 
करू पूर्ण सारे आभाव 
सही जो भूख प्यास 
मेरे अपनों ने 
कर दूँ साकार उन ख्वाहिशों
 को जो देखी सपनों में 
गर्व से सीना चौड़ा हो 
आँखों से गम की जगह 
खुशियों के आंसू हो 
शिक्षित हो उस मुकाम 
को पा लूं मैं
बदल दूँ अपने हाथों 
की उन लकीरों को 
जो विधाता ने धुंधली 
सी बना कर भेजी हैं 
अपनी मेहनत से चमका 
उनको इतना रोशन कर लूं 
बन जाऊं आईना सबके 
के लिये जो मुझमें 
अपना अक्ष देख आगें 
बढ़ने का हौसला पाये 

नेहा धामा " विजेता " बागपत ,उत्तर प्रदेश