जब आँगन मेरे खिली!
कोई कहे देवी उसको
कोई कहे वरदान
मुझे लगा जैसे वो मेरे
जीने का अरमान!
जब वो आई गोद में मेरी
हर पीड़ा को मैंने भुलाया!
क्या होती है माँ की ममता
मुझको समझ तब आया!
बेटा होने की तो खुशियाँ
सारी दुनिया मनाये!
लेकिन उसके पापा
उसको देख मिठाई लाये,
चाहे हो मेरी बेटी सबके लिए एक बोझ
लेकिन एक स्त्री से पूछो कितनी है वो अनमोल
काश के बेटा होता
जब दादी ने उसकी बोला!
सुनकर कड़वी बातें
खून पति का खोला!
बेटी क्या बेटों से कम है
कौन उन्हें समझाए!
जो बेटों के पैदा होने का
ही बस जशन मनाये!
मेरी बेटी शान बनेगी
मेरा वो अभिमान बनेगी!
बस इतना मैं चाहूं!
दानव उसको देख न पाये
सूरज उसको बनाऊ!
अपनी रक्षा आप करे वो
ज्वाला उसे बनाऊंगी!
क्या होती है नारी शक्ति
एहसास उसे मैं करवाउंगी!
चाहे पुरुष हो चाहे स्त्री
कोई नही किसी से कम
गर खुशियाँ ही मनानी सभी को
तो दोनों हो बराबर
एक स्त्री ही बेटी के पैदा होने का शोक मनाए
फिर सोचो भला ये पिछड़ा जमाना
बदल कैसे फिर जाए
दहेज में बहु क्या लाई है
पड़ोस की हर स्त्री पूछे
फिर सोचो इस देश से मेरे
दहेज की प्रथा कैसे छूटे
जब स्त्री खुद को नही बदलेगी
तब तक होगा नही किसी का कल्याण
जो बदलना चाहो देश को अपने
पहले खुद स्त्री को करना खुद में बदलाव
कोमल भलेश्वर

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