"हाय .. मेरी मिश्री की डली .. कैसी है तू.."

सृजन जैसे ही मिशेल के पास उससे गले मिलने के लिए आगे बढ़ी । मिशेल ने उसे हाथ के इशारे से रोक दिया और कहा

"सृजन, प्लीज मुझे टच मत करना। हम लोग दूर से ही बात करें तो कैसा रहेगा ? "

"क्यों मिश्री, क्या हुआ ? तू ऐसा क्यों कह रही है। तू मुझसे , अपनी बेस्ट फ्रेंड से गले नहीं मिलना चाहती? "सृजन को दुख हुआ।

"डोंट माइंड डियर ....बट इट्स वेरी हार्मफुल फॉर अस। पता नहीं कितने बैक्टीरिया हमारे आस पास घूम रहे हैं। जो हमें बीमार कर सकते हैं। गले मिलने से वो एक दूसरे की बॉडी में ट्रांसफर हो सकते हैं। दूर बैठकर ही बात कर लेते हैं ना। "

मिशेल ने अपने माथे से लट हटाकर गॉगल्स लगाए और आराम से सोफे पर बैठ गई।

"मिश्री, मेरे साथ गले मिलने में अब  बैक्टीरिया से डर लगने लगा है तुझे। मुझे विश्वास नहीं होता कि तू वही मिश्री है जिसके साथ मैं अपने टिफिन के साथ साथ अपने कपड़े तक शेयर करती थी। तेरी कोई ड्रेस मुझसे अछूती नहीं रही  और ना ही मेरे टिफिन के आलू के पराठे खाए बिना तेरी भूख मिटती थी। हम दोनों एक दूसरे के गले का हार थे और आज तू ऐसी बात कर रही है"। सृजन ने शिकवा किया।

"अरे यार... तू भी ना बात का बतंगड़ बना देती है।डियर
गले मिलना कोई जरूरी तो नहीं। और वैसे भी ये ओल्ड फैशन हो गया है। अब तो हाय हेलो का जमाना है। तू भी यार , क्या बहनजी टाइप में रहती है। लगता है मॉम की संगत में रहकर तू भी ओल्ड फैशन को लाइक करने लगी है।  मॉर्डन वर्ल्ड में कदम रख कर तो देख दुनिया कितनी आगे बढ़ चुकी है। और तू वहीं खड़ी होकर सो कॉल्ड संस्कारों की दुहाई दे रही है बिना मतलब इमोशनल ड्रामा क्वीन बन रही है।"

"क्या .. मैं अब तुझे ड्रामा क्वीन लग रही हूं? ओके मिश्री.…अब तू पहले जैसी नहीं रही। मैं तुझमें आजभी अपनी बचपन की फ्रेंड तलाशती हूं लेकिन वो शायद गोवा जाते ही कहीं खो गई है और अब मेरे सामने मेरी मिश्री की डली नहीं बल्कि मिशेल रिचर्ड खड़ी है।"

सिस्टर मारिया एक तरफ खड़ी होकर अपनी बेटी को उदास नजरों से देख रही थी। गोवा जाने के बाद वो अपने सारे कल्चर सारे रिश्ते नाते भूल चुकी है। उसके दादाजी ने उसे पूरी तरह अंग्रेज बना दिया है। वो अब अपने आगे किसी को कुछ समझती ही नहीं। उनकी नजरें झुक गईं। 

सृजन ने सिस्टर मारिया से कहा

"आंटी... मैं जा रही हूं अब। आपको मेरी जब भी जरूरत हो आप मुझे बेझिझक बुला सकती हैं। मेरी बचपन की फ्रेंड भले ही मुझे भूल सकती है लेकिन मैं उसे हमेशा याद करूंगी। और अब तभी आऊंगी जब मेरी मिश्री की डली मुझे बुलाएगी । मिशेल रिचर्ड से मिलने अब कभी नहीं आऊंगी।"

इतना कहकर सृजन अपने आंसुओ को छुपाती हुई वहां से चली गई। संयोगिता ने उसे जाते हुए देखा। उसने मिशेल और सृजन की बातें सुन ली थी। उसे मिशेल का व्यवहार बिलकुल अच्छा नहीं लगा। अपनी फ्रेंड के साथ कोई ऐसा व्यवहार करता है क्या ? इतना आत्ममुग्ध होना अच्छी बात है क्या? सृजन को देखकर उसे अपनी फ्रेंड मोहिनी की याद आ गई वो भी उसे ऐसे ही अपनी सबसे अच्छी दोस्त मानती थी। जब उसको अपनी मां साहेब की याद आती थी तो मोहिनी उसकी फ्रेंड की जगह पर मां बन जाती उसका सिर अपनी गोद में रखकर उसके बाल सहलाती रहती। उसके आंसुओ को अपने चूनर में समेट लेती। जब दादी सा उसको मारती या फिर उसे जली कटी बातें सुनाती तब वही उसका सहारा बनकर उसे टूटने से बचाती। वो प्रताप दादू के लड़के की बेटी थी , थी तो वो भी संयोगिता की तरह ही हवेली में रहने की अधिकारी, लेकिन यह दुर्भाग्य ही तो था कि वो भी अपने दादू , दादी  और मां के साथ हवेली के सामने बने हुए झोपड़ी नुमा घर में रहती थी। और हवेली के अन्य नौकरों की तरह यहां काम करती थी। उसके पापा यानी संयोगिता के चाचाजी वीरभान सिंह राजपूत इसी गांव  की सेवा में समर्पित हो गए थे। उनके बलिदान के आगे सारा गांव नतमस्तक था। उन्होंने खुद को उन  शत्रुओं के हवाले करके हजारों ग्रामवासियों की जान बचाई थी ।  गांव वालों ने मिलकर फैसला लिया था कि उनकी बेटी मोहिनी को सारे गांववाले मिलकर पढ़ाएंगे और उनके परिवार का खर्च भी उठाना चाहते थे लेकिन दादी सा को यह कैसे पसंद आता? उनको बेगार करने वाले मजदूर कैसे मिलते? उनकी हवेली के लिए नौकर कहां से मिलते? उन्होंने गांव वालों को सख्ती से मना कर दिया कि कोई भी प्रताप के परिवार की मदद नहीं करेगा ।   क्योंकि इन्होंने इस हवेली के नियम तोड़े हैं । ये लोग पीढ़ी दर पीढ़ी इसी हवेली में काम करेंगे। अगर किसी ने बात नहीं मानी तो उसका अंजाम वो भुगतने के लिए तैयार रहे। गांव वाले दादी सा की बर्बरता को अच्छी तरह जानते थे। इसलिए वो लाचार होकर शांत बैठ गए। और मोहिनी हवेली की बेटी होते हुए भी नौकरों की तरह काम करने लगी। संयोगिता उसकी हमउम्र थी बचपन से ही जब वो प्रताप दादू के पास कहानी सुनने चोरी से जाया करती थी तभी उसकी दोस्ती मोहिनी से हो गई थी। दादी सा की आंखों से बचते बचाते वो मोहिनी के पास जाकर बारिश में छपक छपक कर कूदती थी। दोनों लोग  बगीचे में घुसकर कच्चे करौंदे, इमली, शहतूत, आंवले  तोड़ा करती और टोकरी में भरकर लहसुन मिर्च की तीखी चटनी के साथ किसी पेड़ की शाखा पर बैठकर खाया करती । और बाद में दादी सा के छड़ी की मार भी खाती। लेकिन दूसरे दिन फिर वही। मोहिनी जब उसके पीठ पर छड़ी के निशान देखती तो उसकी आंखे भर आती। लेकिन वो तो नौकर थी क्या कर सकती थी। अक्सर वो खुद भी उनकी छड़ी का प्रसाद पा जाती थी।
नन्हीं सी बच्ची बेंत की मार से तड़प कर रह जाती ।   पीठ पर पड़े नील के निशान जब संयोगिता देखती तो वो चुपके से उन जख्मों पर माला दीदी से  हल्दी का लेप लगवा देती।

मोहिनी और संयोगिता धीरे धीरे बड़े हो रहे थे यौवन का प्रस्फुटन उनके शरीर से दृष्टिगोचर होने लगा था। अब वो लोग खुद को चुनरी से ढकने लगी थी। लेकिन शरारतें अभी भी बच्चों वाली ही थी।

एक दिन........…?
क्रमशः
लेखिका
संगीता शर्मा (सहायक अध्यापक)