हे पुण्य पुनीता जन्मभूमि,
तेरे चरणों में शीष झुकाऊं मैं
तेरी सेवा कर्म है मेरा, तेरी रक्षा मेरा धर्म
आन पड़े जो तेरी आन पर कभी,
न डरूं कभी, न डिगूं कभी,
तेरे चरणों में शीष चढ़ा कर,
यूं अपना धर्म निभाऊँ मैं..
ले लेना शरण में मुझको माता,
सो जाऊं तेरी गोदी में,
तुझ पर प्राण वार दूं,
यूं ममता का कर्ज़ चुकाएं मैं ...
हे जननी, मातृभूमि,
दास पर दया तुम भी सदा करना
मिटूं हज़ारों बार मैं तुझ पर चाहे,
हर बार तेरे ही आंगन में लौट आऊँ मैं....!
शालिनी अग्रवाल
जलंधर

0 टिप्पणियाँ