मां तेरे आंचल के जैसी
ना ही कोई छाया है
मां की ममता के आगे तो
ईश्वर ने भी शीश नवाया है...!

मां तेरे अस्तित्व से ही तो 
मेरी हस्ती है
देखा जो आयना तो जाना
मेरी सूरत में मां तेरी छवि झलकती है...!

मां तेरी परछाई हूं मैं
प्रतिबिंब हूं तेरे अस्तित्व की
तेरी ममता की छाया हूं
पुरवाई हूं तेरे आंचल की...!

जाती हूं जब घर तेरे
तू बनती है पहचान मेरी
ये मन हर्षित हो जाता है,
जब कोई तेरे जैसी मुझे बताता है...!

खुद जब मैं बनी एक मां
तो जाना तेरी ममता का राज
कि सौ दर्दों को सहकर भी
तुझे कैसे हसनां आता है...!

कैसे अनकही बातों को भी
तू पल में समझ जाती है
तभी तो मां बच्चों का
हर हाल में साथ निभाती है...!

सीप में जैसे मोती रहे
वैसी सुरक्षा तेरे आंचल की
हवा के ठंडे झोंके सी
शीतलता तेरी ममता की...!

सूरज की किरणों के जैसी
उज्जवलता तेरे व्यक्तिव की
ईश्वर के अस्तित्व के जैसी
पावनता तेरी ममता की...!!



कविता गौतम...✍️