भाव समर्पण का हो मन में,तो सब कुछ पा जाता है।
हर रस्ता आसान सा लगता, लक्ष्य नजर भी आता है।

प्रेम करो तो करो समर्पण,वरना कोई बात नहीं।
तुमसे अच्छा प्रेम तो फिर,पशुओं में पाया जाता है।
भाव समर्पण का हो मन में,तो सब कुछ पा जाता है।

धर्म कर्म और भक्ति मुक्ति की बातें, कितनी भी कर ले।
मगर बात जब दान की आये,कौड़ी न दे पाता है।
भाव समर्पण का हो मन में,तो सब कुछ पा जाता है।

साम दाम और दंड भेद से,करवा लो तुम मन की बात।
प्रेम मगर प्यारे देखो केवल मन से हो पाता है।
भाव समर्पण का हो मन में,तो सब कुछ पा जाता है।
इंदु विवेक उदैनियाँ
(स्वरचित)