माना, बुरे समय देखा है सबने,
हाँ! इक कठिन दौर से गुज़रे हैं हम,
कुछ खो कर, कुछ बचा कर,
बहुतों को फिर आज़माकर,
हाथों से फिसलता सी
जीवन डोर को थामकर,
गिरते पड़ते, और संभलते,
फिर यहाँ तक पहुंचे हैं हम!
अब जो, जीत हैं यह लड़ाई तो-
आओ विजयोत्सव मनाएं!
त्याग कर क्षोभ सारे, भूल कर सारे गम,
आशा के दीप फिर जलाए हम!
कुछ बुझे-बुझे से कुछ नयनों में
थोड़ा सा उजियारा भर कर,
उचाट, मलिन, से चेहरों को पर-
मीठी एक मुस्कान सजाए कर,
बोझिल-थके-हारे से मन को
नवजीवन की आस से भर कर,
कलान्त, अशांत, अचेतन मन को
नव ऊर्जा दे, सचेत कर,
भूल कर अब बीता हर गम,
हर्ष-दीप जलाएं हम;
मिट जाएं विषाद सब,
रोशन हो अमावस भी ऐसी
छंट जाए गहन, प्रचंड तम,
आओ, दीपोत्सव कुछ यूँ मनाएं हम!
स्वरचित- शालिनी अग्रवाल
जलंधर

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