आता है जब बुढ़ापा, लाचार हो जाते हैं,
क्या कहें, अपने ही साए, साथ छोड़ जाते हैं,
काटे नहीं कटते दिन, रातें बड़ी लगतीं,
रहते सब साथ हैं, फ़िर भी, अकेले रह जाते हैं,
जर जर हुई काया, काम न कोई आया,
आँखे साथ न देतीं, कान भी, बहरे हो जाते हैं,
उम्रदराज हो गये, किसी की कौन सुनता,
किसको क्या कहें, अपने ही, दगाबाज हो जाते हैं,
बनाया घर को, जोड़कर तिनका तिनका,
आज वो घर को, ईट गारे का, मकान बना जाते हैं,
घर परिवार अब, वो परिवार कहाँ रहा,
दिल में जगह नहीं, अब तो रिश्ते, बिछड़ जाते हैं,
सुकून बचा कहां, इस जहाँ में जनाब,
साम दाम दंड भेद, अब रिश्ते भी, तोले जाते हैं,
आता है जब बुढ़ापा, लाचार हो जाते हैं,
आता है जब बुढ़ापा....।
रचनाकार-रजनी कटारे
जबलपुर ( म.प्र.)

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