ख़्याल आते ही भर आतीं हैं आंखें मेरी
बात करने से अंजान सा डर लगता है

जाने किस बात का रंज पिन्हा है मेरे दिल में 
किसी उजड़ी हुई मुहब्बत का असर लगता है

अब तो खग भी नहीं करते हैं बसेरा उस पर
कितना वीरान सा सूखा ये शज़र लगता है

शाम होते ही सहम जाते हैं उजाले घर में
ख़ौफ तेरी यादों से इस कदर लगता है,

तुझको आवाज दूँ और दूर तलक तूँ न मिले,
ऐसे सन्नाटों से अक्सर मुझे डर लगता है।।

डॉ0 अजीत खरे