स्त्री का अस्तित्व अनमोल
स्त्री तेरे रूप अनेक
कभी तो बेटी
कभी तो बहन
कभी माँ कहलाती है
जीवन के हर पड़ाव पर
दुनिया उसको आजमाती है
फिर भी स्त्री हर कदम पर
खुद की अलग पहचान बनाती है,
क्या होता है स्त्री का मन..
कभी किसी ने जाना ही नहीं
उड़ जाऊं बस नील गगन में
छोड़ मोह का रैन बसेरा..
बह जाऊँ बस मंद पवन सी
मीठी मीठी बयार सी...
क्या है स्त्री के मन में...
कुछ देर बैठ गुनगुनाऊँ एकांत में,
सुनहरे दरखतो की छाँव में,
क्या है स्त्री के मन में
आज़ाद हो जाऊ इन झूठी रस्मो रिवाज़ो से,
पा जाऊ बेख्याली सी रातें
क्या है स्त्री के मन में,
पूरी कर पाऊं हर आज़ाद ए ख्वाइश अपनी
जो दफन कर चुकी जिम्मेदारियों तले
क्या होता है स्त्री का मन
चाह नहीं हीरे मोती और अशरफियों की,
स्वाभिमान और इज्जत इनायते नज़र हो बस..

 निकेता पाहुजा ✍️