आज सुदेश कुछ ज्यादा ही गुस्से में था तभी तो सुदेश ने अपनी पत्नी रश्मि को थप्पड़ रसीद कर दिए । रश्मि ने भी गुस्से में आकर थप्पड़ के जवाब में अपना सैंडिल अपने पति सुदेश की तरफ़ फेंक दिया । सैंडिल का एक सिरा सुदेश के सिर को छूता हुआ निकल गया। बात बहुत बिगड़ गई । हमारे पुरुष प्रधान समाज में पुरुष तो सब कुछ कर सकते हैं लेकिन औरतें अगर उन्हें जवाब दें दे तो यह उनकी शान के खिलाफ हो जाता है । सुदेश और रश्मि के बीच सुलह हो भी जाती लेकिन घर - परिवार के सदस्य और रिश्तेदारों के बहकावे में आकर सुदेश ने अपने ऊपर सैंडिल फेंकने वाली बात को लेकर अपना अपमान समझा और मामला पेचीदा साथ ही संगीन भी हो गया । सब रिश्तेदारों ने इसे खानदान की नाक कटना कहा और यह भी कहा कि पति को सैडिल मारने वाली औरत न तो वफादार ही होती है न पतिव्रता ही और तो और ऐसी औरत को घर में रखना भी नहीं चाहिए । बात इतनी आगे बढ़ गई कि सुदेश के रिश्तेदार और रश्मि के रिश्तेदार एक दूसरे के खिलाफ आरोप - प्रत्यारोप लगाते ही जा रहें थे । कहा जाता है कि गलत बातें चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ती है वैसे ही सुदेश और रश्मि की बातें इस कदर बढ़ गई कि नौबत तलाक तक आ पहुॅंची ।
सुदेश और रश्मि की शादी को दस साल हो चुके थे और उन्हें एक ८ साल की लड़की और ५ साल का लड़का भी था । सुदेश और रश्मि की बातें जब तलक तक पहुंची तब मुकदमा दर्ज कराया गया। जैसा की सर्वविदित है कि जीत हासिल करने के लिए लोग किसी भी हद तक गुजर सकते हैं यही वजह थी कि सुदेश ने रश्मि पर चरित्रहीनता का तो रश्मि ने दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया। दस साल तक शादीशुदा जिंदगी बिताने और दो बच्चों के माता-पिता होने के बावजूद आज दोनों में तलाक हो गया । पति-पत्नी तो अलग ही है साथ ही दोनों बच्चें भी अपने माॅं-बाप से अलग हो गए । बेटा छोटा होने की वजह से रश्मि के हिस्से में आया तो बेटी भी अपनी माॅं से अलग होकर पिता के हिस्से में चली गई । दोनों बच्चे भी अपने - अपने हिस्से में आएं माॅं - बाप के साथ थे । उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि ऐसा दिन भी आएगा जब वें चारों इस तरह एक - दूसरे से अलग होंगे ।
सुदेश और रश्मि के हाथों में तलाक के काग़ज़ों की प्रति थी। दोनों चुप थे ... दोनों शांत थे । कुछ बोल ही नहीं रहें थे । मुकदमा दो साल से ऊपर तक चला था । इन २ सालों में सुदेश अपनी पत्नी रश्मि और बेटे अंकित से अलग रह रहा था और रश्मि भी अपनी बेटी अंकिता और अपने पति सुदेश से अलग रह रही थी । मुकदमे की सुनवाई पर दोनों का आना होता था । दोनों एक - दूसरे को देखते भी थें लेकिन आपस में कोई बातचीत नहीं होती थी क्योंकि दोनों में बदले की भावना का आवेश होता था और एक वजह यह भी थी कि दोनों के साथ रिश्तेदार होते थे जो हमदर्दी के नाम पर एक - दूसरे के खिलाफ आग ही उगलते रहते थे । छः महीने पहले तक जब सुदेश और रश्मि कोर्ट में दाखिल होते तो एक - दूसरे को देख कर मुँह फेर लेते थे जैसे जानबूझ कर एक-दूसरे की इग्नोर कर रहे हों। वकील औऱ रिश्तेदार दोनों के साथ ही होते थे । दोनों को अच्छा-खासा सबक सिखाया जाता कि उन्हें कोर्ट में क्या कहना है ??? दोनों वही कहते। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि दोनों के बयान भी बदल गए । बच्चों की भी मर्जी जानने के लिए कोर्ट में पेश हुई लेकिन हालात ऐसे बदलें कि अंत में वही हुआ जो सब चाहते थे । दो साल से जिसके लिए कोर्ट-कचहरी के दोनों चक्कर काट रहे थे अंत में वही हुआ जो होने के लिए दो साल से प्रयासरत थें । सही समझा सभी ने दो साल के बाद सुदेश और रश्मि का तलाक हो गया । मुकदमा जब शुरू हुआ है शुरू - शुरू में दोनों तरफ के रिश्तेदारों की फौज दोनों के साथ होती थी लेकिन आज थोड़े से रिश्तेदार ही दोनों के साथ आए हुए थे । अब दोनों तरफ के रिश्तेदार अपनी - अपनी जीत से खुश थे । वकील खुश थे और माता - पिता भी खुश थे लेकिन
तलाकशुदा रश्मि चुप थी और सुदेश भी खामोश था।
'' कांग्रेच्यूलेशन ! आप जो चाहते थे वही हुआ रश्मि ने सुदेश के दरवाजा खोलते ही कहा ।
'तुम्हें भी बधाई ! तुमने भी तो तलाक देकर जीत हासिल कर ली सुदेश ने कहा ।
तलाक क्या जीत का प्रतीक होता है । रश्मि ने सुदेश से पूछा ।
तुम ही बताओ ? सुदेश के पूछने पर रश्मि ने जवाब नहीं दिया। वो चुपचाप वहीं खड़ी रही ।
' अरे .... अंदर तो आओं तुम्हारा ही घर ......
बात पूरी होती इससे इससे
और धीरे से बोली :- आपने मुझे चरित्रहीन कहा था ।कहा था कि मैं आपके और आपके और घर के लायक नहीं । अच्छा हुआ कि अब आपका चरित्रहीन स्त्री से पीछा छूटा।
वो मेरी गलती थी, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था सुदेश ने रश्मि की तरफ देखते हुए रूंधे गले से कहा।
मैंने बहुत मानसिक तनाव झेला है यह कहते हुए रश्मि रोने लगी ।
जानता हूँ पुरुष इसी हथियार से स्त्री पर वार करता है जो स्त्री के मन और आत्मा को लहू - लुहान कर देता है । तुम बहुत पवित्र हो मुझे तुम्हारे बारे में ऐसी गंदी बात नहीं करनी चाहिए थी। मुझे बेहद अफ़सोस है सुदेश ने कहा।
रश्मि ने एक नजर सुदेश को देखा। कुछ पल चुप रहने के बाद सुदेश ने गहरी साँस ली और कहा :- तुमने भी तो मुझे दहेज का लोभी कहा था।
गलत कहा था सुदेश की ओऱ देखती हुई रश्मि ने कहा । रश्मि कुछ देर चुप रही फिर बोली :- मैं कोई और आरोप लगाती लेकिन मैं नहीं।
अच्छा रूको ! मैं चाय लाता हूॅं । एक बार मेरे हाथ की चाय पी लो । ईश्वर ने बड़ी मुश्किल से यह मौका दिया है आगे यें मौका मिलें ना मिलें । सुदेश ने कहा ।
चाय लेकर सुदेश आ गया । चाय रश्मि ने जैसे ही चाय उठाई चाय ज़रा-सी छलकी। गर्म चाय रश्मि के हाथ पर गिर पड़ी । स........ . की आवाज़ रश्मि के होंठों से निकली ।
सुदेश के गले से भी उसी क्षण 'ओह' की आवाज़ निकली। रश्मि ने सुदेश को देखा। सुदेश की नजरें बस रश्मि को ही देखे जा रही थी ।
''तुम्हारा कमर दर्द कैसा है?''
ऐसा ही है कभी वोवरॉन तो कभी काम्बीफ्लेम रश्मि ने कहा ।
तुम एक्सरसाइज भी तो नहीं करती। सुदेश ने कहा तो रश्मि फीकी हँसी हँस दी।
आपके अस्थमा की क्या कंडीशन है ???? फिर अटैक तो नहीं पड़े???? रश्मि ने पूछा।
'अस्थमा ! डॉक्टर आरोही ने मेंटल स्ट्रेस कम करने को कहा है सुदेश ने कहा ।
रश्मि सुदेश को एकटक देखने लगती है जैसे सुदेश के चेहरे पर छपे तनाव को पढ़ने की कोशिश कर रही हो।
इनहेलर तो लेते रहते हैं न? रश्मि ने सुदेश के चेहरे से नज़रें हटाईं और पूछा।
हाँ, लेता रहता हूँ। आज आपकी साँस उखड़ी-उखड़ी-सी हैं। रश्मि ने हमदर्द लहजे में कहा।
हाँ, कुछ इस वजह से और कुछ... सुदेश कुछ कहते-कहते रुक गया।
कुछ... कुछ तनाव के कारण । रश्मि ने बात पूरी की।
सुदेश कुछ सोचता रहा, फिर बोला :- तुम्हें चार लाख रुपए देने हैं और छह हज़ार रुपए महीना भी देना है ।
'हाँ... फिर? रश्मि ने पूछा।
एक फ्लैट है । तुम्हें तो पता है। मैं उसे तुम्हारे नाम कर देता हूँ। चार लाख रुपए फिलहाल मेरे पास नहीं है।'' सुदेश ने अपने मन की बात कही ।
फ्लैट की कीमत तो बीस लाख रुपए होगी । मुझे सिर्फ चार लाख रुपए चाहिए । बिटिया बड़ी होगी... सौ खर्च होते हैं । रश्मि ने कहा।
' वो तो आप छह हज़ार रुपए महीना मुझे देते रहेंगे उसी में हो जाएगी रश्मि ने कहा। चार लाख अगर आपके पास नहीं है तो मुझे मत दीजिए ।' रश्मि ने कहा।
सुदेश रश्मि का चेहरा देखता रहा। कितनी सह्रदय और कितनी सुंदर लग रही थी सामने बैठी रश्मि जो कभी उसकी पत्नी हुआ करती थी।
रश्मि सुदेश को देखते हुए सोच रही थी कि कितना सरल स्वभाव का है यह सुदेश और तो और अपने बच्चों से कितना प्यार करता हैं । अंकिता कहां है ? रश्मि को कुछ याद आया ।'
वह तो स्कूल गई हुई है । एक घंटे पहले भेजा था । नहीं जा रही थी । बहुत मुश्किल के बाद गई है । सुदेश ने कहा ।
किसी को रखा नहीं आपने ? अब तो आजादी मिल चुकी है । शादी भी कर सकते हैं ।' रश्मि ने कहा ।
सुदेश ने कुछ कहा नहीं सिर्फ रश्मि को देखता रहा । उसे अतीत में दोनों के साथ के पलों की याद आने लगी । वह सोचने लगा कि आजकल दूसरों की बीमारी की कौन परवाह करता है लेकिन यह मेरी परवाह करती थी। कभी जाहिर भी नहीं होने देती थी। कितनी संवेदना थी इसमें। मैं ही अपनी मर्दानगी के नशे में रहा। काश, मैं पहले इसके जज़्बे को समझ पाता।''
दोनों चुप थे बस एक-दूसरे को देखते जा रहें थे । दुनिया भर की आवाज़ों से मुक्त हो कर खामोश। दोनों एक-दूसरे के बारे में ही सोच रहें थे । दोनों की पलकों के कोरों ने उसकी ऑंखो के साथ - साथ उनके दिलों को भींगा दिया था ।
मुझे एक बात कहनी है झिझकते हुए सुदेश ने कहा ।
कहिए ! रश्मि ने सुदेश को देखते हुए कहा ।
डरता हूँ । सुदेश ने कहा।
डरिए मत । हो सकता है आपकी बात मेरे मन की बात हो रश्मि ने कहा।
तुम बहुत याद आती रही ... मेरा मतलब है अंकित और तुम दोनों ही । सुदेश ने नम आंखों से रश्मि को देखते हुए कहा ।
आप भी । रश्मि ने कहा।
मैं तुम्हें अब भी प्रेम करता हूँ सुदेश ने कहा ।
मैं भी । रश्मि ने कहा।
सुदेश और रश्मि दोनों की आँखें कुछ ज़्यादा ही नम हो गई थीं। दोनों की आवाज़ें भी भर्रा रही थी ।
क्या हम दोनों एक-दूसरे को एक मौका नहीं दें सकते ? सुदेश ने पूछा।
किस तरह का मौका ? रश्मि ने कहा ।
हम फिर से साथ-साथ रहने लगें। एक साथ., पति-पत्नी बन कर । अपनों बच्चों के माता-पिता बनकर और बहुत अच्छे दोस्त बन कर। सुदेश ने कहा ।
पर हमारा तो तलाक हो चुका है । रश्मि ने रूंधे गले से कहा ।
तो क्या हुआ ! हम दुबारा शादी कर लेंगे । मैं अपने बेटे अंकित और तुम्हारे बगैर नहीं रह सकता । सुदेश ने कहा ।
अंकित बहुत रो रहा था अब रहा था पापा के पास जाना है । मैंने कहा कि पापा तुम्हें मिलने आएंगे लेकिन उसने कहा कि मिलने नहीं उसे पापा के साथ ही रहना है । रश्मि ने कहा ।
अंकिता को भी मैं अकेला नहीं पाल सकता । वों भी सबके साथ रहना चाहती है । अब मैं पिछली गलती नहीं करूंगा । मैं अपने परिवार को एक करके ही रहूंगा । चलो मेरे साथ । सुदेश ने कहा ।
कहां ? रश्मि ने कहा
अपने बेटे को लाने और कहां। सुदेश ने कहा ।
सुदेश और रश्मि थोड़ी देर बाद अपने बेटे को लाने के लिए निकल पड़े । दोनों की ऑंखों में पहले जैसी ही खुशी झलक रही थी । टूटा हुआ परिवार जो अपने - अपने अहम के कारण टूट गया था अब वह जुड़ने की राह पर निकल चुका था । पति- पत्नी में प्यार और तकरार एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं । इस कहानी में तो सुदेश और रश्मि दोनों को समय रहते अपनी गलती का एहसास हो गया लेकिन सबकी किस्मत उन्हें दुबारा मौका नहीं देती इसलिए किसी भी बात पर जल्दबाजी में कोई भी फैसला नहीं लेना चाहिए ताकि जिंदगी भर उस बात का अफसोस हो और पछताना पड़े ।
धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻
" गुॅंजन कमल " 💓💞💗

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