देखो तो कैसे-कैसे इंसान,बदल गया है यारों,
काट रहे हैं सभी यहाँ,एक दूजे को मेरे यारों।

न सच्ची ज़ुबान रह गयी,ना ही सच्चा ईमान रहा,
नहीं रह गया जज्बात कोई,ना सच्चा इंसान रहा।

सीधे साधे लोगों का,जीना कितना मुश्किल होता,
चुप रह कर घुट घुट कर जीना,अब है ऐसा होता।

दो धारी तलवार बन गया,आज का लोभी इंसान,
कब किसे चोटिल कर दे, इतना हो गया बेईमान।

पहले ऐसे नहींथा बिलकुल,इंसानियत थी जिन्दा,
अगर कोई दुष्कर्म करे तो, होती थी उसकी निंदा।

गाँव गाँव में घर घर में भी,सब करते थे बड़ा प्यार,
आपस में सब एक दूजे से, मिल कर रहते थे यार।

आज समय परिवर्तित है,कपटी हो गया है इंसान,
अपने भले केलिए ही सोचे,खोये जाता है ईमान।। 

समय कभीभी एक रहे ना,सब का कभी बदलता,
आज जोहै बलवान वही,कल रुक-2 के है चलता।

हर अन्याय अत्याचार के,फल यहीं भोगते मिलते,
नाम किसी का क्यों मैं लूँ,कर्म फल यहीं हैं मिलते।

समय के साथ बदल लो,ये जीवन सफल बनाओ,
उपकार करो दिल में दया,भाव की जगह बनाओ।


रचियता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.