स्त्री हूँ मैं
हाँ एक स्त्री हूँ मैं !
नहीं हूँ मैं किसी कवि की कविता
न ही किसी शायर की शायरी हूँ
बस एक ओजस्वी शब्द हूँ मैं
स्त्री हूँ मैं
हाँ एक स्त्री हूँ मैं !
न ही मैं चाँद हूँ, न ही चाँदनी
न नदी हूँ, न ही निर्झर रागिनी
न ही सुघडता की मूरत हूँ
न मधुरता की हूँ चाशनी
एक स्त्री हूँ मैं
हाँ बस एक स्त्री हूँ मैं !!
न रूप रंग का संगम हूँ
न कद-काठी का उपहार
मृगनयनी सी हूँ नहीं मैं
न पंखुरियों सी कोमलता का कलश
आँचल में मेरे केवल शीतलता नहीं
न चरणों में है स्वर्ग
बस अदम्य साहस का परिचय हूँ
एक स्त्री हूँ मैं
हाँ बस एक स्त्री हूँ मैं !!
न दो अलंकारों का उपहार मुझे
न ही मुझे महिमामंडित करो
न दुर्गा न काली
न लक्ष्मी न ही सरस्वती कहो
पहाड़ों सी पदवी दे कर
अहल्या बनाने पर न विवश करो
मानव जन्म लिया है जग में
उसे मानव सा सम्मान ही दो
करने दो ज़िद थोड़ी सी
पंखों को थोड़ा उड़ान दो
लक्ष्मण रेखा के बाहर बैठा रावण
इसकी पहचान तो करने दो
स्वप्न देखे इतना हक़ तो दे दो
स्वच्छन्दता से कदमताल तो करने दो
जीवन के हर क्षण को बोती काटती
सन्तुष्टि का अभिमान तो दो
एक स्त्री हूँ
बस स्त्री सा मान तो दो
बस स्त्री सा मान तो दो.......
मधुलिका सिन्हा
मैलिक और सर्वाधिकार सुरक्षित

0 टिप्पणियाँ