औरत तेरा अस्तित्व कहां...?
तू  सृष्टिसृजन का तारतम्य ..
तू ममता की अधिकारी है 
खुद बनी अकिंचन ..
रहती है, कैसी तेरी लाचारी है..
समर्पित किया जीवन ..
सजाया प्यार का चमन ..
फिर भी बिलख पड़ा मन ..
तेरी प्रतिभा का कायल जन ..
फिर भी तेरा नेतृत्व कहां ..?
औरत तेरा अस्तित्व कहां ..?
तेरी सीरत ..की गाथाएँ 
इतिहास काल में अमर रही  ..
तू मदालसा तू सावित्री 
यमराज भी तेरे कायल हैं  ..
तू वीरांगना है भारत की 
प्रतिशोधी तुझसे घायल हैं  ..
निज का सम्मान बचाने को 
तू आज भी पल-पल मरती है..
कहीं पूज्या बन सजती जाती ..
कहीं तेरी पीड़ा उभरती है..
जुवे ने तुझको हारा है 
जंगल ने तुझे दुलारा है ..
तेरी साँसों की डोरी ने 
तुझको फिर से ललकारा है .
.नारी अब   नहीं रही   अबला ..
फिर से संहार प्रबल  होगा ..
रक्त बीज, महिषासुर का 
हर वार सदा निर्बल होगा..
नारी को अबला  माना गर 
निर्मल ऐसा व्यक्तित्व कहां ?
औरत तेरा अस्तित्व कहां ..??