हो चाहे परदेस में तुम
लेकिन दिल में मेरे रहते हो
चाहे मीलों के हो फासलें
फिर भी साजन कहलाते हो
क्योंकि पल-पल दिल के पास तुम रहते हो।
ठीक से चेहरा तुमने ना देखा
मेहँदी मेरी अभी गई नही
हाथों का चूड़ा नही निहारा
परदेस में जाकर बैठ गए
यूँ तो तेरी बनी ब्याहता
नई दुल्हन बनकर आई हूँ
लेकिन किसको बतलाऊँ मैं अब
फिर भी कुँवारी कहलाई हूँ
प्यार तुम्हारा नही मिला है
महसूस किया नही स्पर्श तुम्हारा
चाहे बहु बनी मैं तेरे इस घर की
पर पत्नी नही बन पाई हूँ
ना जाने कब लगेगा वीजा
कब सँग तेरे मैं जाऊँगी
डर लगता है मुझको साजन
क्या इन्तेजार में सदियाँ बिताऊंगी
आज हो गया पूरा साल
फिर भी तुम नही आए साजन
क्या परदेस में सौतन मिल गई
जो मन तेरे भाए साजन
अब डर लगता मुझको इतना
सारी उम्र ना यूँ ही बीते
पल पल रहते हो दिल के पास
ये ज़िंदगी हाथ से यूँ ही ना छूटे
आज हो गई सत्तर की मैं
लेकिन आज भी कुँवारी ही हूँ
दुल्हन बनकर आई थी साजन
अब बूढ़ी बनकर विदा मैं लूँ
अब तो आओ मेरे साजन
मेरा अंतिम संस्कार करो
हक नही दिया मुझे पत्नी का तुमने
बस आखिरी विनती पूरी करो।
Note-मेरी ये रचना उन लड़कियों के लिए जिनके माँबाप nri लड़के से इस लालच में लड़की की शादी कर देते हैं कि हमारी बेटी विदेश जाएगी और वो बेटी अपने पति की याद में ही पूरी जिंदगी बिता देती है।
ॐ नमः शिवाय
🙏🙏🙏🙏🙏
कोमल भलेश्वर
यमुना नगर(हरियाणा)

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