बहुत सुना है शब्द ये
पर क्या मिलती है मुक्ति
कष्टों से, मोह- माया से मुक्ति
जन्म -मरण से लोक से मुक्ति
पर मिलती है क्या मुक्ति
प्रेम मे ही तड़पना, बहुत कुछ सहना पड़ता है
प्रेम कैसा भी हो इस ममता से कोई नहीं ले सकता मुक्ति
कहते है न बंधन ही तो सृजन की पीड़ा है, 
तभी तो मुक्त हो कर भी  प्रेम  मे बंधी मीरा है
ईश्वर के  प्रति सच्ची भक्ति, 
           ही है मुक्ति
जलते है दिया बाती एक साथ और हो जाते है मुक्त, 
जन्म मरण, सुख दुःख, सार असार
पर करते हैं विचार बार बार, 
त्याग कर  सब  मुक्त हो कर पा ले मुक्तिll